--तुफैल अहमद

भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व द्वारा योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद से, अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भारतीय राष्ट्रवाद के स्वरुप की ओर केंद्रित हुआ है। ऐसा इसलिये है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में योगी आदित्यनाथ को कई वीडियो में मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध घृणास्पद भाषण देते हुए देखा जा सकता है। ऐसा पहली बार हुआ हो, ऐसा नहीं है। 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब भी यह बहस तेज हुई थी। लेकिन तब मोदी से संबंधित ऐसा कोई भी वीडियो सामने नहीं आया था जिसमें यह कहा जाये कि मोदी ने मुस्लिम या अन्य किसी समुदाय के विरुद्ध नफरत से भरी बातें कहीं हैं।

ऐसे में जब वैश्विक मध्यमार्गी और वामपंथी विचारधारा मोदी और योगी के राजनैतिक उत्थान को भारतीय राजनीति में आये हिंदुत्ववादी बदलाव के रूप में देखती है, अधिकतम दक्षिणपंथी विचारक भी इसे हिंदू-राष्ट्र की स्थापना की दिशा में एक कदम के रुप में देखते हैं। इस विचार का समर्थन मुस्लिम धार्मिक नेता, मध्यमार्गी-वामपंथी विचारधारा वाले भारतीय संपादक और पत्रकार भी करते हैं। हालांकि यह विचार पूरी तरह से सही नहीं है। मोदी-योगी को मिले राजनैतिक समर्थन को केवल भारतीय राष्ट्रवाद में हिंदुत्ववादी परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा सकता, खासतौर पर इसलिये क्योंकि ये दक्षिणपंथी उभार हालिया दौर में अन्य देशों में भी देखने को मिला है। जैसे कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, यूनाइट किंगडम में ब्रेक्सिट के समर्थन में वोट पड़ना एक तरह से रुढ़िवादी विचारों के उत्थान जैसा लगता है।

हिंदुस्तान से लेकर अमेरिका तक पूरी दुनिया में इस तरह के राजनैतिक परिवर्तन की वजह यह है कि कुछ विचारधाराओं के ढांचे में आधारभूत परिवर्तन हुआ है जो कि पिछली कुछ सदियों में संपूर्ण विश्व पर प्रभावी रहीं हैं। वर्तमान में भारतीय राजनैतिक बहसों में केवल दो तरह के लोग भाग लेते हैं। एक, मोदी समर्थक दूसरे, मोदी विरोधी। हमारे दैनिक जीवन में, हर व्यक्ति एक दूसरे से अलग है और विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचार रखता है। पर जब सवाल देश के राजनैतिक मुद्दों का आता है हम सब केवल दो दलों में विभाजित हो जाते हैं। इन में से एक धड़े को वामपंथी, मध्यमार्गी-वामपंथी और उदार-धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है तथा दूसरे को दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी कहा जा सकता है।

इन को ऐसे परिभाषित किया जा सकता है- एक उदार-वामपंथी वह है जो आशावादी है और सामाजिक वास्तविकताओं के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखता है। वह सामाजिक स्थिति पर अपने विचार थोपने की कोशिश करता है और उन को वैसा दिखने की कोशिश करता है जैसा उस के विचार से उनको होना चाहिए न कि जैसी वह है। वहीं दूसरी तरफ एक रूढ़िवादी व्यक्ति निराशावादी होता है और सामाजिक स्थिति को ले कर वैसे ही विचार रखता है जैसी वह है। इसलिए एक रूढ़िवादी, सामाजिक स्थिति की वैसी ही व्याख्या करता है जैसी वह वास्तविक धरातल पर है। इनके फलस्वरूप होने वाले वैचारिकता के युद्ध में अब डोनाल्ड ट्रंप, नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे रूढ़िवादी जीत रहे हैं। जबकि पिछली सदी के अधिकतम समय में, उदार-धर्मनिरपेक्ष विजेता की स्थिति में थे। अब वैश्विक परिस्थितियां ऊपर से नीचे उलट रहीं हैं। वह विचार जो संपूर्ण विश्व में पिछली पूरी सदी हावी रहा, आज हार रहा है। पिछली सदी की मध्यमार्गी-वाम विचारधारा को समझने के लिए दो सिद्धांत हैं-उदारवाद और राष्ट्रवाद। हम राष्ट्र/राज्य की जिस अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में आज रह रहे हैं वह 1648 में वेस्टफेलिया की संधि के बाद अस्तित्व में आई। यह शांति संधि, 30 वर्षीय युद्ध के समाप्ति की परिणीति थी। 1618 से 1648 तक चले 30 वर्षीय युद्ध मुख्यतः प्रोटेस्टेन्ट और कैथोलिक समुदायों के बीच के धार्मिक युद्ध थे। लेकिन इन युद्धों के दौरान उस समय की बड़ी वैश्विक शक्तियां भी इन युद्धों में शामिल हो गईं। 1648 में वेस्टफेलिया की संधि के परिणामस्वरूप युद्ध दो सिद्धांतों पर समझौता होने के बाद समाप्त हो गया। ये थे, संप्रभुता और उस समय के राज्यों के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करना।

उस समय के अधिकतर राज्य धार्मिक प्रकृति के थे। हालांकि वेस्टफेलिया की संधि के बाद राष्ट्र-राज्य का जन्म हुआ। तब के राष्ट्र-राज्य धार्मिक होने के बजाय क्षेत्रीय प्रकृति के थे और वे संप्रभुता का सम्मान करने और एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर राजी हुए। यही वह संसार है जिसमें आज हम रहते हैं। लेकिन इस शांति संधि परिणामस्वरूप वो बुद्धिजीवी जिन्होंने ये 30 वर्षीय युद्ध देखे थे, धर्म के महत्व को कमतर/खोखला करने लगे। उन लोगों ने एक उदार वैश्विक विचार को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जिसमें धर्म का स्थान बहुत कम था और इसी के फलस्वरूप धर्मनिरपेक्षता को जन्म दिया। यह वैश्विक विचार आगामी सदियों में प्रभावी होता चला गया। धर्मनिरपेक्ष समुदाय प्रभुत्व में आ गया। इस विचार ने भारत में भी जगह बनाई। पश्चिम में शुरू होने वाला अन्य प्रमुख विचार राष्ट्रवाद है। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लगभग 100 मिलियन लोग मारे गए, ये आंकड़ा उन मौतों को भी मिलाकर है जो इस दैरान बीमारियों और कुपोषण से हुई। दोनों विश्वयुद्ध राष्ट्रवाद के नाम पर लड़े गये। जिन बुद्धिजीवियों ने ये दो वर्षीय युद्ध में हुए खूनखराबे को देखा था उन्होंने राष्ट्रवाद(के विचार) को भी खोखला करने की कोशिशें की। इसलिए पिछली सदी में धार्मिकता लगातार कमजोर पड़ती गयी, उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता को विश्विद्यालयों और सरकारों से प्रोत्साहन मिला और राष्ट्रवाद का बुद्धजीवियों, लेखकों, संपादकों और प्रोफेसरों द्वारा मज़ाक उड़ाया गया। यह चलन खासतौर पर 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद हुआ जिसका उदार-धर्मनिरपेक्ष एजेंडा सभी प्रतिभागी राष्ट्रों-राज्यों पर बड़े पैमाने पर थोपा गया।

पश्चिम में उभरते इस विचार को भारतीय बुद्धजीवियों, प्रोफेसरों और लेखकों ने आंख मूंदकर अपनाया, जिन्होंने यूरोपीय अवधारणा के राष्ट्रवाद और धर्मनिर्पेक्षता को भारतीय समाज और राजनीति पर थोपने की कोशिश की।

धर्मनिर्पेक्षता के दो अर्थ हैं- पहला, एक विचार आंदोलन रूप में, यह लोगों के जीवन से धर्म के महत्व को कम करता है और दूसरा, एक संवैधानिक आदेश के रूप में यह राज्य को धर्म से दूर रखने की नीति है।

भारत अति प्राचीन कल से ही एक बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक सभ्यता रही है। यूरोप में पहचान और सांस्कृतिक समानताओं से उत्पन्न राष्ट्रवाद से विपरीत भारत में राष्ट्रवाद विभिन्नताओं से उत्पन्न हुआ था।

वास्तव में भारत बहुलतावाद और सहअस्तित्व के सिद्धांत का मूल संस्थापक है। कोई भी दूसरा राष्ट्र इस विचार के कॉपीराइट का दावा नहीं कर सकता है। हालांकि पश्चिमी अवधारणा के राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता को थोपने के क्रम में भारतीय बुद्धजीवियों ने स्थानीय स्वदेशी विचारकों को दबा दिया। अतः अब हमारे पास एक अंग्रेजी बोलने वाला लेखक समुदाय है जिसने हिंदी और अन्य स्थानीय भाषाओं में लिखने वाले मौलिक लेखकों के योगदान को दबा दिया है। इसी दौरान, लोकतंत्र, जो कि 1776 में अमेरिका के लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने के साथ ईजाद हुआ कई देशों में फैल गया, और लोगों में जागरूकता आयी कि 'जनता शक्तिशाली होती है न कि शासक'। लोकतंत्र की अवधारणा 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद और विस्तृत हुई है।

अब लोकतंत्र में लोग अपने वोट की ताकत और अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा जागरूक हैं तो उनके समर्थन में ज्यादा राजनैतिक परिवर्तन हो रहे हैं। चाहे 2014 में नरेंद्र मोदी का मामला हो या 2016 में डोनाल्ड ट्रंप का... यह देखने में आ रहा है कि जनता अपने वोट की ताकत से पिछली सदी राजनैतिक सोच को हटा देना चाहती है और इसके द्वारा उन बुद्धजीवियों, लेखकों और संपादकों को भी हटा देना चाहती है जो 'सच के पंच' बने हुए थे। जैसे-जैसे भारत में लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होंगी पश्चिम में शिक्षित बुद्धजीवियों का यह समूह और उनका वैश्विक विचार जनता द्वारा उखाड़ दिया जायेगा। इसी कारण से ये बुद्धजीवी आजकल 'बिन पानी की मछली' की तरह तड़प रहे हैं। इन लोगों को सांस लेना भी मुश्किल दिखाई दे रहा है; और इसीलिये वो यह शिगूफा फैलाते हैं कि असहिष्णुता बढ़ रही है। 2017 उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कोई लहर जैसी चीज नहीं थी। बस हुआ यह कि बुद्धजीवी संसार अस्त-व्यस्त हो गया। इसलिए ज़मीनी राजनेता, कार्यकर्त्ता और लेखक अब जीत रहे हैं।

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(एक समय बीबीसी में पत्रकार रहे तुफैल अहमद वर्तमान में नई दिल्ली स्थित 'ओपन सोर्स इंस्टीट्यूट' के कार्यकारी निदेशक हैं। ट्विटर पता @TufailElif)