संत तिरुवल्लुवर से जुड़ी एक कहानी है। उनकी साधु प्रवृत्ति और क्रोध न करने की बात सब लोग जानते थे। एक धनिक ने ठान लिया कि वह संत तिरुवल्लुवर को नाराज़ करके लोगों के सामने साबित कर देगा कि उन्हें भी (तिरुवल्लूवर को) गुस्सा आता है।

संत तिरुवल्लुवर बुनकर थे। उस धनिक ने संत से कपड़ा खरीदा और उन्हीं के सामने उसे टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया।

तिरुवल्लुवर ने उन टुकड़ों को अपने हाथ में उठाया और उस धनिक से पूछा, ''आपने इसे फाड़ क्यों दिया?''

उस धनिक ने बोला कि ''आपको क्या मतलब? मैंने आपको पैसे दिये, आपका कपड़ा लिया। अब कपड़े पर अधिकार मेरा है। मैं अपने सामान का कुछ भी कर सकता हूँ। आपका इसमें कोई अधिकार नहीं है।''

तिरुवल्लुवर पूरी तरह शांत रहे। लेकिन उस धनिक से पूछा, ''आपको पता है, इस कपड़े को बनाने में कितने लोगों का कितना श्रम लगा? कपास को उगाने में कितना पानी लगा? कपास से बिनौले निकालने में कितना श्रम लगा? कपड़ा बुनने में कितना समय लगा? शायद आपको नहीं पता होगा। यह सच है कि आपने अपने पैसे के बल पर उस पर अधिकार कर लिया। लेकिन इस कपड़े को बनाने में समाज का जो समय और श्रम लगा उसका क्या हुआ? वह क्या फाड़ने के लिए बनाया गया था? उस सामाजिक श्रम और उसको बनने में लगे संसाधन का क्या यही हश्र होना चाहिए?"

"सिर्फ़ इसलिए कि, आप धनिक हैं?''

प्रिय पाठक आप जान ही गए होंगे कि पर्यावरण दिवस पर इस कहानी का क्या औचित्य है।

हमारे मानस में एक श्लोकांश है- ''माता भूमिः, पुत्रोहं पृथिव्याः" अर्थात हमारी माता पृथ्वी है और हम उसके पुत्र (संतान) हैं। अतः हमें संसाधनों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसे अपनी माँ के साथ। कितनी उदात्त भावना है! गांधी जी क्या इसी बात के उदाहरण नहीं लगते? संत तिरुवल्लुवर क्या यही भाव नहीं व्यक्त करते हैं? जी हाँ। यही भाव है उनका। आबिद सुरती प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट हैं। मुंबई में रहते हैं। हर इतवार को अपने साथ वे एक प्लम्बर लेते हैं और चल देते हैं घर-घर पानी के लीकेज़ को रोकने... अपने ख़र्चे पर... एक-एक बूंद बचाने। (मैंने यहाँ विस्मयादि-बोधक चिह्न '!' नहीं लगाया क्योंकि मुझे तो इसमें कुछ भी विस्मयकारी नहीं लगा)

शायद कुछ अन्य लोग भी हैं जिनको अधिक प्रेरित करता है- "वीर भोग्या वसुंधरा" अर्थात वीर और शक्तिशाली लोग ही इस धरती/वसुंधरा का उपभोग कर सकते हैं।

भोग वह भी धरती का!

हमारे मानस का हिस्सा बनीं, हमको 'प्रेरित' करने वाली ये सूक्तियां हमारे कर्मों को भी गहरे से प्रभावित करती हैं।

क्या नहीं?

क्या अमेरिका ''वीर भोग्या वसुंधरा'' के मंतव्य से संचालित नहीं लगता?

क्या सारे शक्तिशाली इसी मंतव्य से संचालित नहीं लगते?

क्या धनी वर्ग इसी वीर भोग्या वसुंधरा मानसिकता से संचालित नहीं लता?

मुझे तो ऐसा ही लगता है।

पर्यावरण संरक्षण पर पेरिस संधि से अमेरिका के बाहर आने की घोषणा के बाद सारे विश्व में एक स्वर में निंदा हो रही है।

भारत ने अपने आधिकारिक बयान में जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों से जुड़े रहने की प्रतिबद्धता जतायी है। यह स्वागत-योग्य है। फ़्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रॉन का बेहद समझदारी भरा बयान आया है- ''there is no plan B as there is no planet B"

भारत को भी सारे सांस्थानिक प्रयास करने चाहिए जिससे कि आगे आने वाली पीढ़ियां हमें सम्मान की नज़र से देख सकें। नागरिकों को भी अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे और नागरिक प्रयास ऐसे मामलों में कहीं अधिक वज़न रखते हैं। क्योंकि संसाधन पृथ्वी पर सीमित हैं। लेकिन क्या हम अपने तौर-तरीकों को लेकर संत तिरुवल्लुवर या महात्मा गांधी या ऐसे ही कई नींव की ईंट बने लोगों की तरह सोच पाते हैं? या हम कहानी के उस धनिक की तरह हैं जिसने कपड़ा खरीद के फाड़ दिया? क्या हम सच्ची ज़रूरत के अलावा भी चीज़ें इकठ्ठा करते हैं? क्या हम हर वस्तु के प्रयोग के समय यह सोच पाते हैं कि उसे बनाने में कितना सामाजिक श्रम और कितना संसाधन लगा होगा? और अपने अधिकार में लेने या प्रयोग करने में क्या हम उस सामाजिक उपयोगिता वाले बिंदु पर सोच पाते हैं? क्या हमारी फ़िज़ूलख़र्ची हमारे बाक़ी भाई-बहनों को भूखा और बिना कपड़ों के या कम कपड़ों के रख रही है?