राजकुमार शुक्ल पर लिखी गयी पुस्तक 'सौ साल पहले (चम्पारण का गाँधी)' एक आवश्यक कार्य था जिसे लेखिका डॉ सुजाता ने शिद्दत से करने की कोशिश की है। शुक्ल के जीवन के विभिन्न पक्षों पर लेखिका ने बड़े ही आत्मीय ढंग से लिखा है। शुक्ल के जीवन की चालक और प्रेरक शक्ति का उद्घाटन जिन प्रसंगों के माध्यम से किया है, वे बड़े ही जीवंत और विश्वसनीय बन पड़े हैं। अपनी दूसरी पत्नी और पहली पत्नी की बेटियों से उनके जुड़ाव के प्रसंग बेहद सच लगते हैं।

राजकुमार शुक्ल के जीवन को केंद्र में रखते हुए चम्पारण सत्याग्रह पर भी लेखिका की विस्तृत और ज़रूरी नज़र पड़ी है। एक अहम आंदोलन के बारे में, उसकी कार्यशैली और रणनीति के बारे में और उस आंदोलन से उपजे सात्विक-नैतिक क्रोध से गुजरना निश्चित रूप से पाठक के तत्त्वांतरण के लिए अहम हो सकता है।

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'सौ साल पहले' पुस्तक को लिखने में जो श्रम सुजाता ने किया है, वह प्रसंशनीय है। स्मृतियों को फिर से दोहराना (रिप्रोड्यूश करना) सहज नहीं है... और ख़ासकर उनके उल्लेख में स्वाभाविकता रख पाना और भी कठिन है। लेखिका इन मानदंडों में एक हद तक सफल हुयी हैं।

ब्रिटिश शासन के समय के कराधान का विवरण लेखिका ने अत्यंत प्रामाणिकता से किया है और उससे निपटने के राजकुमार शुक्ल के प्रयासों में एक नेतृत्व के विकास की प्रक्रिया पाठक आत्मसात कर सकता है। यह पुस्तक के पेज 36 पर वर्णित है... जिसमें 46 तरह के करों का विवरण है। इन करों में आम के बौर आ जाने पर 'अमही' टैक्स, गोरे साहब को घाव हो जाने पर घबही टैक्स, बपही, पुतही टैक्स और हर त्यौहार पर लगने वाले टैक्स... दशहरी, चैतनौमी, दवात पूजा, फगुआही टैक्स... राजकुमार शुक्ल इन सब चीजों से कितने व्यथित होते थे कि रात-रात भर इस बारे में सोचते रहते थे, सो नहीं पाते थे।

पुस्तक की कुछ कमजोरियां हैं, जिनसे शायद बचा जा सकता था; वर्तनी के दोष हैं। शायद वाणी प्रकाशन ने 'प्रूफरीडिंग' की ज़रूरत नहीं समझी। भाषा के प्रयोग में भी लेखिका असावधान रही हैं। कई जगह लगता है कि लेखिका के मन में है 'चूंकि अच्छा लेखन वह है जिसमें लोकोक्ति और मुहावरे के प्रयोग हों' इसलिए उन्होंने उनका असावधान इस्तेमाल किया और कई जगह असंगत या कम संगत प्रयोग किये हैं। ऐसा करना पाठक की आस्वाद प्रक्रिया को निश्चित रूप से प्रभावित करता है। पुस्तक का आवरण पृष्ठ भी असंगत लगा। चम्पारण के गांधी पर लिखी पुस्तक के आवरण में भी महात्मा गांधी? कम-से-कम राजकुमार शुक्ल की छोटी तस्वीर तो आवरण पृष्ठ में होनी ही चाहिए। हालांकि पुस्तक में शेख गुलाब, शीतल राय, लोमराज सिंह और पीर मुहम्मद मुनीस के बारे में लिखा गया है लेकिन चरित्रों को उठाने की कोशिश पर्याप्त नहीं है। ख़ासकर पीर मुहम्मद मुनीस के बारे में ऐसा संभव था। पीर मुहम्मद ने ही अख़बार प्रताप के माध्यम से पूरे हिंदुस्तान को चम्पारण की त्रासदी से परिचित कराया था।

लेकिन इन कमियों के बावज़ूद चम्पारण के गांधी पर लिखी यह पुस्तक पढ़नी चाहिए क्योंकि पुस्तक से गुजरना पाठक को निश्चित रूप से समृद्ध करेगा। चम्पारण आंदोलन के बीज से पौधा बनने की प्रक्रिया, और उस पौधे के स्वतंत्रता आंदोलन के विराट वृक्ष में बदलने की सहज गति इसमें देखी जा सकती है। और इस पूरी प्रक्रिया में राजकुमार शुक्ल के दृढ़निश्चयी व्यक्तित्त्व की उपस्थिति उन्हें एक विराटता देती है। यह व्यक्तित्त्व उदात्त है, महत्त्वाकांक्षी है, विनयी है और दृढ़ भी।

मुझे इस पुस्तक से गांधी शैली के आंदोलन की ठोस ज़मीन पर उपज, प्रक्रिया और उसकी गहराई समझने में मदद तो मिली ही मिली, साथ ही एक समांतर भावभूमि पर भी ऐसी प्रक्रिया क्यों और कैसे होती है, जो कि पूरी तरह एक गांधियन फेनोमेना है, को भी समझने में मदद मिली।

लेखिका- सुजाता, प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, मूल्य- 495/- (हार्ड कवर), पृष्ठ- 238