समीक्षा कभी भी मूलपाठ नहीं हो सकती। अच्छी समीक्षा पुस्तक को पढ़ने का कारण दे सकती है और न पढ़ने का भी। मेरी दृष्टि में अच्छी समीक्षा पुस्तक का आस्वाद भी कराती है, जिससे वे लोग भी जो नहीं पढ़ सकते, को पुस्तक की खूबियों-खामियों के बारे में पता चल सके और उसको जान सकें। ज्ञान और सूचना बढ़ सके। पाठक का संवेदनात्मक विकास शायद पुस्तक के मूल-पाठ से ही ज़्यादा संभव होता है। मेरा समीक्षा का यह पहला गंभीर प्रयास है, पाठक यदि राय देंगे तो व्यक्तिगत रुप से मुझे लाभ होगा: समीक्षक

भालचंद्र नेमाड़े की पुस्तक 'हिंदू' जीने का एक समृद्ध कबाड़ मूलतः मराठी में लिखी गई ऐसी पुस्तक है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। गोरख थोरात ने इसका अनुवाद किया है।

एक समय मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर चेयर ऑफ कंपेरेटिव लिटरेचर में प्रोफेसर तथा विभाग प्रमुख रहे भालचंद्र नेमाड़े मराठी के बहुत ही महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं। उनकी कई मूल पुस्तकें रही हैं। नेमाड़े जी ने काफी अनुवाद कार्य किया है। ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी और यशवंतराव चौहान पुरस्कार सहित कई महत्वपूर्ण पुरस्कार उनके खाते में हैं।

पुस्तक का शीर्षक काफी रोचक है जिस में 'हिंदू' के साथ-साथ "जीने का समृद्ध कबाड़" लिखा हुआ है। चूँकि लेखक ने कोई आमुख नहीं लिखा, अनुवादक ने भी कोई टिप्पणी पुस्तक के बारे में नहीं की है। इसलिए निश्चित तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि "जीने का समृद्ध कबाड़" क्यों प्रयोग किया लेकिन पुस्तक पढ़कर जो राय बनती है, उससे यह कहा जा सकता है कि एक 'हिंदू' की जीवन शैली का जीवन, सांस्कृतिक मायनों में बड़ा समृद्ध है, भले ही उसका अधिकांश कबाड़ की तरह निष्प्रयोज्य और हटा देने लायक हो।

उपन्यास के रूप में लिखी यह पुस्तक उपन्यास से कहीं अधिक है। पुस्तक "भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना" का बृहद आख्यान है, जिसमें मोहनजोदड़ो से लेकर बीसवीं सदी तक के भारत की सामाजिक संरचना का समाजशास्त्रीय पाठ बेहद प्रामाणिक ढंग से, कथात्मक-शैली में निरुपित किया गया है।

शैली के दृष्टिकोण से इस पुस्तक में कई अभिनव प्रयोग दिखते हैं।

पुस्तक का पूरा पाठ फ़्लैश-बैक शैली में लिखा है। मुख्य-पात्र स्वयं से ही संवाद करता है-'मैं, मैं हूँ-खंडेराव'।

'हिंदू' पुस्तक में हिंदी के प्रख्यात आंचलिक लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की याद दिलाती ध्वन्यात्मकता, आंचलिक मिठास है। ढेर सारे ऐतिहासिक सच्चाईयों को साथ लेकर चलने के बावज़ूद कथ्यात्मकता ढीली नहीं पड़ती। एक सधे हुए उपन्यासकार की तरह हर पात्र के जीवन को निरूपित करने में भी नेमाड़े जी सफल हुए हैं।

कई जगह दृश्य तो फिल्म की तरह रचे गए हैं। वे स्वयं और इसको पढ़ते हुए एक पाठक के तौर पर आप उन क्षेत्रों (भू-क्षेत्र के साथ-साथ काल की भी) की प्रामाणिक यात्रा करते हुए लगते हैं।

मसलन, संवेदनात्मक दृष्टि से लेखक पाठक से बेहद आत्मीय संवाद करता है। इसका एक उदाहरण देखिए...

घर आने पर भावडू की पट्टी बांधी जाने लगी थी। छोटी सी गौरैया का अपनी माँ से चिपक कर किया गया जबरदस्त अंतर्नाद कोठी के बाहर भी सुनाई दे रहा था। ऐसा रुदन हम जैसे केवल आंखों से रोने वालों को दुख की अभिव्यक्ति का, उसकी सही गहराई का अनुभव करा रहा था। इस छोटी सी बच्ची का दुख कितना ऊपर तक पहुंच गया है! उसके मुकाबले हमारे जीने की तीव्रता कितनी नीचे है? हमें उम्र के मुताबिक पूरे शरीर के साथ उफन कर रोना भी नहीं आता।

इस किताब में लेखक कई भारतीय परंपराओं का एक साथ प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पुस्तक में कहीं संत नामदेव हैं, कहीं तुकाराम तो कहीं कबीर... और इन संतों की सबसे प्रामाणिक आवाज़ परंपरा में, जीवन में जिस रूप में है, उसका अंकन नेमाड़े जी कुशलता से कर पाये हैं।

लेखक में पूरे मानव समुदाय के लिए गहरा प्यार दिखता है, संवेदना दिखती है। सांस्कृतिक रूप से परिपक्व किसी व्यक्तित्व में मानव मात्र के प्रति जो गरिमा का भाव होना चाहिए और जिसकी अपेक्षा की जाती है, वह नेमाड़े जी में स्पष्ट दिखती है।

भिखारियों के प्रति लेखक क्या सोचता है, इसको आप यहाँ देख सकते हैं...

यह लोग हम पर जबरदस्ती तो नहीं करते हैं कि हमें पैसा दो, किसी को सताते भी नहीं हैं, झमेला भी खड़ा नहीं करते हैं। इनमें कहीं भी महत्वाकांक्षा से भरी दानवी-वृत्ति दिखाई नहीं देती और मुख्य बात यह है कि बिना किसी घमंड, पाखंड के ईमानदारी और तन-मन-धन से यह घोषित करना कि हम दीन-हीन हैं। आशा-मोह का त्याग कर चुके हैं, कितना धैर्य चाहिए? इसके लिए भीख मांगने के लिए भी कितना धैर्य लगता होगा? भविष्य के शांति-प्रिय मानवीय समाजों को आगे चलकर यही आदर्श रूढ़ करने पड़ेंगे। भीख मांगने का विनम्र बड़प्पन, साधारण पैसे वालों को लगने वाला डर, इन्हें कभी नहीं सताता। इनसे कहीं ज्यादा लाचारी पार्लियामेंट के लोगों में, फौजी अफसरों में होती है। यूनिवर्सिटी के प्रमोशन पाने वाले प्रोफेसर तो इन से बहुत ज्यादा लाचार होते हैं। क्या वे पाखंडी मौका-परस्त लोग कभी ईमानदारी से घोषित करेंगे कि होड़ा-होड़ी की दुनिया से हम पूरी तरह बाहर हो गए हैं, हार मान ली है? भिखारी यह काम बड़े साहस के साथ करते हैं।

लेखक में मनोविज्ञान की भी गहरी समझ दिखती है। पुस्तक का एक पाकिस्तानी पात्र जलील साहब पाकिस्तान की स्थिति के बारे में टिप्पणी करता हुआ पुस्तक के पहले भाग में मिलता है। ऐसा लगता है कि जलील साहब कोई 'बहके' हुए से व्यक्ति हैं! उदाहरण के लिए जलील साहब कुछ यूँ बात करते हैं...

आप कुछ भी कहिए बच्चा लोग, इस महाद्वीप में असल सहिष्णु व्यक्तित्व किसका बन रहा होगा, आपको क्या लगता है पाकिस्तान (?हिंदुस्तान) के हिंदुओं का या हिंदुस्तान (?पाकिस्तान) के मुसलमानों (?हिंदुओं) का? बचपन से इस अल्पसंख्यक वर्ग का हर तरह से मानसिक दम घोंटना। 'आप सभी देशद्रोही हैं', जैसे बचकाने आरोप और वे भी मुसलमान (?हिंदू) गुंडों द्वारा। हमेशा उन बेचारों को जताना कि वे (पाकिस्तान में हिंदू, भारत में मुसलमान) पराए हैं, पहचानने की घुट्टी बचपन से ही मिल जाती है।

लेखक कहना चाहता है कि कई मायनों में "हिंदुस्तान और पाकिस्तान बराबर संकीर्णता से आगे बढ़ रहे हैं।"

लेखक में इतनी समझ है कि वह सिर्फ समस्या को उठाकर आगे नहीं बढ़ते वे बल्कि वज़नदार हल भी बताते हैं। कुछ यूँ...

हिंदू अगर अपनी सांस्कृतिक परिधि को बड़ा करते हैं और मुसलमान भी अपनी सांस्कृतिक विरासत में मोहनजोदड़ो, ऋग्वेद, रामायण, महाभारत सबको अपने ही देश का मान लेते हैं तभी बटवारा रुकेगा।

भारत की प्रचुर विविधता को समझना और उसको अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के हिसाब से समझ पाना और बरतना बेहद जटिल काम है, लेकिन लेखक अपनी परिपक्वता से उसे रेखांकित कर पाते हैं। देखिये इस उदहारण में...

जब तक हिकारत करने वाला नहीं होता तब तक हीनता भी नहीं होती। कैसे मानें कि अंडमानी-निकोबारी, भील, गोंड, लद्दाखी, तिब्बती... हजारों जनजातियां पिछड़ी हुई हैं? यह किसने और किस आधार पर तय किया कि शोषण करने वाले ही प्रगत (अगड़े) हैं?

लेखक संवेदनाओं को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। मसलन, लेखक किताब में पीएचडी करने के लिए मुख्य पात्र खंडेराव विठ्ठल अपने गुरु सांखलिया सर से कहता है...

सर, संबंधित काल की संवेदना ही कहाँ जाती हैं? लिपि, घरों की रचना, सड़कों की रचना, नगर रचना, परकोटा, मुद्रा, चित्र... इन सभी बातों के पीछे क्या संवेदनाए नहीं होती हैं? और यदि होती हैं तो उनकी खोज को हमारे कार्यक्षेत्र में शामिल क्यों न किया जाए?

ये पुस्तक इतनी विस्तृत है कि भारत की हर छोटी-बड़ी समस्या को कहीं न कहीं छूती जरूर है। ऐसे में जातीय संरचना का जिक्र भी इसमें बेहद प्रामाणिकता के साथ किया गया है। हालांकि उनके अध्ययन का क्षेत्र महाराष्ट्र ही है लेकिन वास्तविकता में देखा जाए तो यही पूरे भारत की सच्चाई है। पुस्तक भारतीय जातीय समाज का, उसकी सांस्कृतिक संरचना का ऐसा विश्वसनीय आख्यान है और सच कहें तो उत्खनन है कि इसे भारतवर्ष की विराट इकाई को समग्रता और संपूर्णता से देखने का समर्थ प्रयास कह सकते हैं। ऐसा प्रयास विरल है।

लेकिन एक बात यहाँ गौर करने लायक है। लेखक द्वारा जातीय समाज का अध्ययन संवेदना के साथ चलता है लेकिन यहाँ लेखक अपनी बेहद व्यंग्यपूर्ण, जमीन से जुड़ी शैली के साथ जातीय संरचना का वर्णन करते हैं। इससे एक तो उपन्यास की पठनीयता बढ़ जाती है और दूसरे, यथार्थ की जानकारी भी बड़ी सहजता से हो जाती है।

चूंकि 'परिवार' इकाई भारतीयता की पहचान है अतः परिवार व्यवस्था का बेहद यथार्थ अंकन इस पुस्तक में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए पुस्तक में, खंडेराव का अपना परिवार, उसके अंदर चलने वाले ढेर सारे सकारात्मक-नकारात्मक समीकरण बड़े ही रोचक तरीके से कथानक में आते हैं और पाठकों को अपने साथ जोड़े रखते हैं।

संयुक्त परिवार में अनेक पश्चगामी प्रवृतियां भी सक्रिय होती हैं। महिलाओं का, बच्चों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व होता है, इस मामले में भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था निर्दोष नहीं कही जा सकती और न ही हर बात पर दोषी है। लेखक का ऐसे मसलों पर दृष्टिकोण बेहद संतुलित रहा है।

कुल मिलाकर भारतीय समाज की महत्वपूर्ण इकाई के रुप में परिवार को वांछित गरिमा देने में पुस्तक सफल है। लेकिन यह गरिमा 'आत्ममुग्ध'' करने वाली नहीं बल्कि 'आत्मावलोकन' करने वाली है।

पुस्तक के आवरण (फ्लैप) पर लिखा है कि उपन्यास में अनेक पात्र हैं लेकिन केंद्र में कोई पात्र नहीं बल्कि 'संपूर्ण समाज' है, वही समग्रता में एक पात्र की तरह व्यवहार करता है। समाज ही संवाद करता है न कि लोग।

नेमाड़े जी का ग्रामीण समाज का चित्रण बेहद यथार्थ पूर्ण है और पुस्तक पढ़ते समय लगातार प्रेमचंद, विजयदान देथा जैसे साहित्यकार याद आते रहे।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि पुस्तक बेहद पठनीय है। डॉक्टर गोरख थोरात का अनुवाद बेहद प्रशंसनीय है। अनुवाद में मराठी प्रभाव भी बरकरार रखा गया है जो कि परिवेश के प्रामाणिक अंकन में पुस्तक को समर्थ रख पाया है। पुस्तक को पढ़ते हुए यह जिज्ञासा उपजती है कि जिस पुस्तक का अनुवाद इतना पठनीय है, वह पुस्तक अपने मौलिक रुप में कितनी आस्वाद वाली होगी!

भालचंद्र नेमाड़े की यह पुस्तक पढ़ते समय लगातार यह एहसास बना रहा कि लेखक भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक समग्रता के सच्चे प्रतिनिधियों में से एक हैं।

अंत में मेरे लिए यह पुस्तक "अगर इस पुस्तक को न पढ़ता तो बहुत कुछ महत्वपूर्ण छूट जाता" वाली श्रेणी में आती है।

पुस्तक के संबंध में अन्य जानकारी- संस्करण- द्वितीय, प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, मूल्य- 499 (पेपरबैक), पृष्ठ- ५४८