राष्ट्रवाद पर चर्चा, वक्तव्य और सैद्धांतिकी विशाल मात्रा में उपलब्ध है। मेरी अपनी समझ के लिए भी, जाहिर तौर पर, इन सब उपलब्धताओं ने व्यापक असर डाला है।

राष्ट्रवाद अपने आधुनिक अर्थ में मुख्यतः यूरोपीय उपज है। राष्ट्रवाद की धारणा 'मध्यकालीन सामंतवाद को प्रस्थापित' करके उभरती है और सारे सभ्यतागत अर्थों में अपने पूर्ववर्ती समय से प्रगतिशील भी है। लेकिन इतिहास की गति समझने वाले लोगों का मानना है कि हर नयी धारणा, जो कि अपनी पूर्ववर्ती धारणा से एक कालखंड विशेष के संदर्भ में प्रगतिशील होती है, भविष्य में छिपे सभी अंतर्विरोधों से वह मुक्त नहीं हो सकती। समय गतिशील है, इसकी शायद सबसे सरल (?जटिल) अभिव्यक्ति भी यही है।

राष्ट्रवाद के बारे में विभिन्न विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। कोई इसे 'मानव जाति के सर्वोत्कृष्ट मूल्यों' सत्यम, शिवम् और सुंदरम से जोड़ता है तो कोई सत्ता की भूख का जरिया समझता है, और कोई अन्य इसे खोखली नारेबाजी कहता है। कुछ विद्वान राष्ट्रवाद की जगह पर 'देशभक्ति' की बात करते हैं।

लगभग विरोधी लगने वाले इन वक्तव्यों को बोलने/लिखने वाले लोगों की धारणाओं की तह में विस्तार से जाने पर पता चलता है कि 'राष्ट्र' से उनके अभिप्राय भिन्न हैं या फिर वे अपनी अपनी दृष्टि में सकारात्मक और नकारात्मक मूल्यों से परिभाषित राष्ट्रवाद को या तो एकदम निर्दोष या पूरी तरह दोषयुक्त ढंग से देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

राष्ट्रवाद की इस श्रृंखला में अभी तक प्रकाशित लेख
राष्ट्रवाद: 'एक भारत' का उदय और पश्चिमी अवधारणा
राष्ट्रवाद: देशभक्ति पर जुनून का झंझावत

राष्ट्रवाद: योगी आदित्यनाथ के बाद भारतीय राष्ट्रवाद

सामान्य अर्थों में राष्ट्रवाद 'देश से प्रेम और निकटता' को ही प्रकट करने वाला अभिप्राय देता है। ऐसे में राष्ट्र'वाद' का देश 'प्रेम' से जो अंतर है वह मिट जाता है और सामान्य दृष्टिकोण एक घालमेल का शिकार हो जाता है। सामान्य जन के लिए यह बहुत ही सहज और स्वाभाविक सी बात है लेकिन वे लोग, जो उनकी निश्छल भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना चाहते हैं या कम से कम उस भावना का शोषण करके अपने राजनीतिक हित साधना चाहते हैं, उनके लिए यह बहुत आसान औजार के रूप में काम करता है। यह घालमेल 'अनालोचन' को बढ़ावा देता है। सत्तारूढ़ वर्ग राष्ट्र से प्रेम को अपनी राजनीतिक चालों की वैधता के लिए इस्तेमाल करता है और लोग इस उठी हुयी धूल के कारण स्पष्टता से देख नहीं पाते हैं। नारेबाजी, भावनात्मक वक्तव्य जैसी चीज़ें सतह पर तैरने लगते हैं। थोड़ा कटु होकर बोलें तो राष्ट्रनिर्माण के लिए जिस 'नैष्ठिक समर्पण' की ज़रूरत होती है और जो करना कहीं श्रमसाध्य काम है, की जगह जब नारेबाजी से ही साबित होने लगे कि राष्ट्रवादी-राष्ट्रप्रेमी हुआ जा सकता है तो फिर लोग किधर जाएंगे, ज़्यादातर लोग आसान रास्ते की तरफ ही जायेंगे न?

राष्ट्रवाद पर विचार करते समय सामान्य अभिप्राय को महत्त्व दिया जाए या विशेषज्ञों के द्वारा सिद्धांत-स्थापना को? शायद दोनों ही ज़रूरी हैं क्योंकि सामान्य अभिप्राय सारे व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण है वहीँ अकादमिक महत्व के लिए और समय और स्थान की सीमा समझने में विशेषज्ञ का दृष्टिकोण ही महत्वपूर्ण होता है। सामान्य अभिप्राय विशेषज्ञ के लिए बार-बार अध्ययन सामग्री बनते हैं।

ख़ैर, विद्वानों की राय में भारत में स्वस्थ राष्ट्रवाद की जगह पर 'स्थानापन्न' राष्ट्रवाद ने अपनी जड़ें जमायीं और राष्ट्रवाद को लेकर जो दूषण दिखता है, वह इसका ही परिणाम लगता है। इसको समझने के लिए बिपनचंद्र और सुमित सरकार को पढ़ना होगा। सब जानते हैं कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम कंधे से कंधा मिलाकर साथ थे। 1882 में प्रकाशित आनंदमठ सन्यासी विद्रोह का जो चित्रण करता है और जिसमें मुगलों को दुश्मनों के रूप में चित्रित किया गया है, वह भी इस बहाने से की अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खुले आम लिखना खतरनाक हो सकता था क्योंकि बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में थे। हिंदी समालोचक प्रफुल्ल कोलख्यान लिखते हैं- "अपने को `खतरे' से बचाने के लिए पूरे राष्ट्र को खतरे में डाल देने का मामला क्या इतना सरल है!" यही वह समय है जब हिंदू और मुस्लिम नेतृत्त्व में से कुछ लोग केवल और केवल अपने धर्मों/समाज से संबंधित बुराइयों के खिलाफ लड़ने लगे और धार्मिक पहचान वाले संगठन बनने लगे। जो अंततः भारत के स्वस्थ राष्ट्रवाद के लिए बाधक ही साबित हुए। हिंदू-मुस्लिम एकता में दरार पड़ने लगी और समय के साथ यह दरार चौड़ी ही होती रही।

राष्ट्रवादी कई प्रकार के हैं या यूं कहें कि राष्ट्र के संदर्भ में सोचने के कई संभव तरीके हैं (मेरा यह आनुभविक अध्ययन किसी फील्ड स्टडी पर आधारित नहीं है और इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर कोई भी उंगली उठा सकता है)

1) एक सिरा उद्धत या उग्र-राष्ट्रवादियों की श्रेणी में आता है। उद्धत राष्ट्रवादी राष्ट्र के नाम को लेकर लगभग अंधा हो जाता है। एक किस्म का उन्माद उस पर तारी रहता है। संक्षेप में कहें तो वह राष्ट्र को लेकर अतिशय भावुक होता है और बिना किसी तर्क-प्रणाली के, बिना विवेक का प्रयोग किये राष्ट्र के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। ऐसे लोग सामान्य तौर पर औजार के रूप में सत्ता-संरचना द्वारा प्रयुक्त होते हैं। ऐसे राष्ट्रवादी लोग जब किसी सकारात्मक काम के लिए लगते हैं तो उसके परिणाम भी उनकी संख्या के अनुपात से अधिक आते है। मसलन उपनिवेश-विरोध के लिए यदि ऐसा गुट सक्रिय हो जाए तो देशप्रेम और देश के लिए मर मिटने का प्रखर भाव दिखता है। लेकिन यदि उपनिवेश विरोध जैसा आंदोलन देश-काल की आवश्यकता न हो तो ऐसे गुट का, या ऐसी विचारधारा का विद्यमान रहना विनाशकारी परिणामों वाला ही होता है।

2) दूसरा प्रकार जो अपने आप को राष्ट्रवादी नहीं कहता लेकिन राष्ट्र के मामलों में प्रेम और भक्ति भाव रखता है। भड़काने पर या भड़क जाने पर यह समूह पहले प्रकार में रूपांतरित हो जाता है।

3) तीसरा प्रकार जो राष्ट्रवाद के मामले में तो मौन रहता है लेकिन देश से एक मूक प्रेम करता है और देश की अच्छाई और भलाई में निश्छल विश्वास करता है और उस भलाई को अच्छाई को बढ़ाने में अपने हाथों से योगदान करता है। राष्ट्र को वह जरुरी समझते हैं।

4) चौथे प्रकार के लोग राष्ट्रवाद की कोई जरूरत नहीं समझते उनके लिए देश प्रेम देश की अच्छाई जरूरी है।

राष्ट्र के बारे में गैर-आनुपातिक बातचीत ही अपने आप संदिग्ध है। राष्ट्र को सबसे अधिक मजबूत वे लोग करते हैं जो इसकी बात किये बिना अपना छोटा या बड़ा काम लगन और ईमानदारी से करते हैं। अपनी भूमिका को सही से समझते हैं। उसका निर्वाह करते हैं। खेत पर श्रम करने वाला किसान और मज़दूर से लेकर कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी अपने लिए निश्चित की गई भूमिका को जब बिना राग-द्वेष के पूरा करता है, तो वह राष्ट्र को मज़बूत कर रहा होता है।

5) पांचवी प्रकार के लोग वे हैं जो राष्ट्र को नकारात्मक संदर्भ में देखते हैं। उसकी संकीर्णता और तंग-नजरी को अपने विचार का केंद्र बिंदु बनाते हैं और राष्ट्रवाद के नाम पर जो भी हंगामें होते हैं उनको लक्षित करके राष्ट्रवाद प्रत्यय की ही आलोचना करते हैं और उसके बदले मानवतावाद और अंतरराष्ट्रवाद की वकालत करते हैं।

राष्ट्रवाद के बारे में विचार करने वाले हर धड़े, हर व्यक्ति के विचार को मान्यता भले न दें लेकिन उसकी भर्त्सना करने में सावधान रहने की ज़रूरत है क्योंकि ऐसी हर अगंभीर आलोचना/भर्त्सना उन लोगों के लिए खाद पानी का काम करता है जो इसको किसी निहित उद्देश्य के लिए प्रयुक्त कर सकते हैं/करते हैं।

राष्ट्र के संदर्भ में सैद्धांतिक दृष्टि से विचार करते हुए विचारकों ने कुछ इस प्रकार का विभाजन किया है: नृजातीय, नागरिक, धार्मिक-राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय-राष्ट्रवाद, विस्तारवादी-राष्ट्रवाद, उत्तर-औपनिवेशिक राष्ट्रवाद, उदार और वामपंथी ढंग का राष्ट्रवाद। लेकिन मैंने जानबूझकर इस दृष्टि से विचार नहीं किया है।

अंत में, राष्ट्र के संदर्भ में या किसी भी प्रत्यय, अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक समूह की अच्छाइयों, बुराइयों या फिर किसी भी वाद की अच्छाई और बुराई को जांचने का सामान्य तरीका, मेरी दृष्टि में, यह है कि यह देखा जाए कि आमतौर पर उस दृष्टि, विचार या समूह का धरातल पर परिणाम किस रूप में आता है। यह देखना होगा कि प्रस्तुत वाद विचार या संगठन के कार्यकलाप मनुष्यता के सार्वभौमिक मूल्य- समानता, भाईचारा, स्वतंत्रता और न्याय को प्रतिष्ठित करने वाले हैं, मज़बूत करने वाले हैं या इससे दूर ले जाने वाले हैं। यह समझना भी आसान नहीं है इसके लिए विवेक और विश्लेषण की निश्छल क्षमता का होना ज़रूरी है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो प्रज्ञायुक्त संवेदना का होना ज़रूरी है। यदि यह समझ किसी व्यक्ति के पास नहीं है तो वह हमेशा छला जा सकता है, भ्रम में रह सकता है, वह निहित तत्त्वों द्वारा गुमराह किया जा सकता है और सबसे रोचक बात यह है कि उसे यह सब पता भी नहीं चलेगा।

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