राजनीति और सत्ता। जो लोग राजनीति को कतई पसंद नहीं करते, उनसे इन शब्दों के मायने पूछिए तो एक-सौ कमियां गिना देंगे और पूरे जीवनभर इन दोनों से अपने आपको दूर रखने की कसमें भी खा लेंगे। लेकिन जो लोग इसे पसंद करते हैं, वे...? हर हाल में इसे पाना चाहते हैं और एक बार मिल जाए तो हर कीमत पर इसे बरकरार रखना चाहते हैं। हर कीमत पर, किसी भी कीमत पर...! संभव है कि हर बार ऐसा न होता हो लेकिन आपातकाल के 19 काले महीनों में तो ऐसा ही हुआ था, जब सत्ता की कुर्सी से चिपके बैठे मठाधीश हर हाल में, ऐनकेन-प्राकारेण अनंत समय तक कुर्सी पर बैठे रहना चाहते थे।

संबंधित, पढ़ने लायक:

आपातकाल के मायने: मौत सब के लिए समान है, मेरे लिए भी, तुम्हारे लिए भी

आपातकाल के मायने: एक कलाकार की मौत

वैसे तो इंदिरा जी द्वारा सत्ता पाने की ललक को प्रधानमंत्री शास्त्री जी की मौत के बाद से ही उनके प्रयासों से समझा जा सकता है लेकिन अगर हम एक क्षण के लिए इसे भूल कर आगे भी बढ़ जाएं तो इमरजेंसी के घटनाक्रम आपको भूलने नहीं देंगे।

संपूर्ण क्रांति या व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन का नारा लोकनायक जेपी (जय प्रकाश नारायण) ने दिया था लेकिन हक़ीक़त में कोशिश इंदिरा गांधी द्वारा की गई थी।

हम सभी संविधान के कुख्यात 42वें संसोधन के बारे में जानते हैं, जिसे मिनी संविधान निर्माण के नाम से भी जाना जाता है लेकिन इस बात की जानकारी कम ही है कि इमरजेंसी में इंदिरा सरकार लोकतंत्र की वर्तमान संसदीय प्रणाली को बदलकर राष्ट्रपतीय या अध्यक्षीय प्रणाली लाने पर गंभीरता से विचार कर रही थी। स्वयं इंदिरा जी के शब्दों में "देश लोकतंत्र से ऊपर है"। एक दूसरी जगह उन्होंने टॉमस जेफरसन (संयुक्त राज्य अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति) को उद्धृत करते हुए कहा था कि राष्ट्रों के संविधान पर हर बीस वर्ष बाद विचार किया जाना चाहिए।

उनके इस कथन से अलग-अलग आशय निकालने वाले मिल जाएंगे जिसमें पक्ष-विपक्ष की बहस भी हो सकतीहै लेकिन इमरजेंसी के ठीक बात नेशनल हेराल्ड (प. नेहरू जी द्वारा शुरु किया गया अख़बार, जिसे लेकर कुछ दिन से विवाद चल रहा है) में लिखे संपादकीय लेख में स्पष्ट कर दिए थे। इसके हिसाब से- यह जरुरी नहीं कि वेस्टमिंस्टर मॉडल ही सबसे उत्तम मॉडल हो और कई अफ्रीकी देशों ने इस बात का प्रदर्शन कर दिया है कि लोकतंत्र का बाहरी मॉडल कुछ भी हो, जनता की आवाज़ का महत्व बना रहेगा। एक कमजोर केंद्र होने से देश की एकता, अखंडता और स्वतंत्रता को खतरा पहुंच सकता है। यदि देश की स्वतंत्रता कायम नहीं रह सकी तो लोकतंत्र कैसे कायम रह सकता है।

लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा मेरा देश, मेरा जीवन में लिखते हैं कि इस लेख में तंजानिया जैसे अफ्रीकी देशों में लागू एक दलीय प्रणाली की प्रशंसा की गई थी। (जिसका आशय है कि इंदिरा जी पूरी गंभीरता से व्यवस्था परिवर्तन पर विचार कर रही थीं)

आगे बढ़ने से पहले यहाँ लोकतांत्रिक भारत की राजव्यवस्था के बारे में इतना जानना जरुरी होगा कि लोकतंत्र की संसदीय व्यवस्था में उत्तरदायित्व सामूहिक और संसद के प्रति होता है, मतलब सरकार या सरकार का मुखिया जो भी करता है, उसका जवाब उसे संसद में देना होता है जबकि राष्ट्रपतीय प्रणाली में ऐसा कोई दायित्व नहीं होता। इसमें संसद और राष्ट्रपति बिल्कुल दो अलग-अलग छोरों पर रहकर काम करते, जहाँ राष्ट्रपति से रोज-रोज प्रश्न नहीं पूछे जा सकते हैं। एक अन्य अंतर है कि राष्ट्रपतीय प्रणाली में राष्ट्र का प्रमुख सीधे जनता द्वारा निर्वाचति होता है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 83 में विशेष परिस्थितियों में संसद का कार्यकाल बढ़ाने का प्रावधान मिलता है लेकिन इमरजेंसी के दौर में सरकार इतने से संतुष्ट नहीं थी। इसीलिए उसने संविधान संसोधन का सहारा लिया। यह भी व्यवस्था परिवर्तन का एक उदाहरण है।

देश में नई व्यवस्था कैसी हो और कैसे इसे लाया जाए, इस बात की जानकारी हमें वरिष्ठ पत्रकार और इमरजेंसी के समय जेल में रहने वाले कुलदीप नैयर की किताब इमरजेंसी रिटोल्ड से मिलती है। हालांकि इंदिरा गांधी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन चाहती थीं लेकिन उनके (कथित प्रोग्रेसिव) समर्थक भी इस पक्ष में नहीं थे। शायद इसलिए कि उन्हें लगता था कि जनता को 'शांत' और 'अनुशासित' रखने के लिए किसी नई व्यवस्था की जरुरत नहीं, वर्तमान व्यवस्था ही पर्याप्त है।

फिर भी कई लोगों को संविधान में बदलाव लाने का विचार दिया गया। जिसमें लंदन में भारतीय उच्चायुक्त और परिवार के संबंधी बी.के. नेहरु भी शामिल थे। बी.के. नेहरु ने सुझाव दिया कि भारत में फ्रांस जैसा संविधान होना चाहिए, जहाँ प्रधानमंत्री की जगह राष्ट्रपति शीर्ष पर हो और शक्ति का वास्तविक प्रयोगकर्ता भी वही हो। कुलदीप नैयर के शब्दों में बी.के. नेहरु इंदिरा गांधी को द गॉल बनाना चाह रहे थे।

लोकतांत्रिक देश में सैद्धांति रुप से निर्णय सामूहिकता से लिया जाता है लेकिन व्यवहार में प्रधानमंत्री की इच्छा ही सबकी इच्छा मानी जाती है। तो ऐसे में जब इंदिरा जी ने एक दलीय और राष्ट्रपति प्रणाली के बारे में सोचा होगा तो निश्चित ही अधीनस्थों ने इसे बिना किसी रोकटोक के स्वीकार किया होगा। जैसा ऊपर कहा गया है कि कांग्रेस में बहुत से लोग इस विचार के पक्ष में नहीं थे कि व्यवस्था परिवर्तन किया जाए लेकिन फिर इस मामले में तीन लोग ऐसे थे जो कुछ ज्यादा ही इस फैसले के पक्ष में थे। उनमें से एक, इंदिरा जी के बाद नंबर दो की हैसियत रखने वाले संजय गांधी थे। इनके अनुसार चुनाव कराने की कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए जब बड़े आराम से दो-तीन साल तक यूं ही चलाया जा सकता है। दूसरे, हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंशीलाल थे। बंशीलाल के अनुसार जब भरत, (श्री)राम की खड़ाऊं से 14 साल अयोध्या में राजकाज संभाल सकते हैं तो आप (इंदिरा गांधी) क्यों नहीं?

ऐसा मानने वाले तीसरे थे देवकांत बरुआ, जिनके लिए संजय गांधी विवेकानंद के समान थे तो इंदिरा गांधी भारत थीं, और भारत ही इंदिरा गांधी था। (इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा)

अब प्रश्न उठता है कि इतना सब होने के बाद इंदिरा गांधी ने इस विचार को क्यों त्याग दिया? वह भी ऐसे समय जब कोई भी उनके निर्णय पर सीधे-सीधे 'ना' बोलने की हिम्मत नहीं करता था। पार्टी (और सरकार में भी) में नंबर दो की हैसियत रखने वाले संजय गांधी इसके पक्ष में थे ही, और संजय गांधी ने मुख्यमंत्रियों को इस हद अपनी उंगलियों पर नचा रखा था कि मुख्यमंत्री स्वयं उन्हें हवाई अड्डे पर अगवानी करने जाते थे।

इसका जवाब या तो शायद इंदिरा जी स्वयं जानती थीं या फिर इसे तत्कालीन परिस्थियों में खोजा जा सकता है। दरअसल, जब से इमरजेंसी लगी थी, तब से यह माहौल बनाने की कोशिश की जा रही थी कि मध्यम वर्ग इस नई व्यवस्था से बहुत खुश है। उच्च या पढ़े-लिखे वर्ग को इससे ज्यादा मतलब नहीं था, इस वर्ग की प्रतिक्रिया संतुलित (न्यूट्रल) किस्म की थी। प्रेस को जबर्दस्त सेंसर किया गया था और सैंकड़ों पत्रकारों को जेल में ठूंस दिया गया था फिर भी भारतीय प्रेस का अनुमान था कि इंदिरा जी की लोकप्रियता में बहुत गिरावट नहीं आई है (इसी प्रेस ने बाद में अनुमान लगाया कि चुनाव में कांटे का मुकाबला होगा जिसमें इंदिरा गांधी को बढ़त मिलेगी), आईबी और रॉ भी समय-समय पर सरकार के पक्ष में गोपनीय रिपोर्टें दे रहे थे (इन्हीं रिपोर्टों में इंदिरा सरकार को इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में 300-350 सीटें जीतने का अनुमान जताया गया था)।

ऐसे में देखें तो सब चीजें इंदिरा गांधी की सरकार को अपने अनुकूल जान पड़ रही थीं। तो संभव है इसी शिगूफे में व्यवस्था परिर्वतन का विचार त्याग दिया गया और सरकार महज़ 42वां भारी-भरकम संविधान संसोधन करके संतुष्ट हो गई।

(स्रोत:- मेरा देश मेरा जीवन और नज़रबंद लोकतंत्र- लालकृष्ण आडवाणी, इमरजेंसी रिटोल्ड- कुलदीप नैयर)