ये कहानी है 19 महीने के उन अंधेरे दिनों की, जिन्हें हम आपातकाल (इमरजेंसी) के नाम से जानते हैं। कथित फासीवादी शक्तियों से लोकतंत्र को बचाने के लिए हज़ारों-हज़ार लोगों को बिना कारण बताए जेल में ठूंस दिया गया। इनमें से अधिकतर की गिरफ्तारी मीसा (मैंनेटेनेंस ऑफ सिक्योरिटी एक्ट) के तहत हुई थी। विडंबना देखिए कि ये वही कानून था जिससे तहत तस्करों, ड्रग-माफियाओं को पकड़ा जाता था। फिर चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की गिरफ्तारी रही हो या किसी और नेता की... हम यहाँ जो किस्सा लाए हैं वह जॉर्ज फर्नांडिस को पकड़ने के लिए पुलिस द्वारा उनके भाई लारेंस फर्नांडिस पर किए गए बेइंतिहा शोषण का है। इसे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर साहब की किताब इमरजेंसी रिटोल्ड से लिया गया है। हिंदी में अनुवाद किया है अभिषेक गोस्वामी 'हर्षवर्धन' ने...

तो पढ़िए और जानिए कि आपातकाल के मायने क्या थे... उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी...

ये घटना मई, 1976 की एक रात की है। जब मैंने किसी को अपना नाम पुकारते हुए सुना। मुझे लगा कि मेरा कोई मित्र होगा, इसलिए मैं दरवाजा खोलने गया। तुरंत ही मैंने एक पुलिस जीप घर के बाहर खड़ी हुए देखी। आवाज़ लगाने वाला सादा कपड़ों में खड़ा एक पुलिस अफसर था। उसने बताया कि पुलिस मेरा बयान दर्ज कराने के लिए मुझे ढूंढ रही है क्योंकि माइकल (उसका छोटा भाई, जो भारतीय दूरसंचार उद्योग में एक इंजीनियर था और उसे भी 'मीसा' के तहत गिरफ्तार किया गया था) द्वारा कोर्ट में दाखिल एक लिखित याचिका से मेरा संबंध है। मुझे लगा कि इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, इसलिए मैं घर पर अपने बूढ़े माँ-पापा को सूचना दिए बिना ही उनके साथ चल दिया।

पुलिस ने एक घंटे तक मेरा बयान रिकॉर्ड किया और इसके बाद वो मुझे गुप्तचर दल के दफ़्तर ले गए। वहाँ पहुंचते ही किसी ने अचानक मुझे एक जोरदार थप्पड़ रसीद दिया, ये इतना जोर से पड़ा कि कुछ देर के लिए मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। जब मुझे होश आया, तब मुझे आभास हुआ कि इन लोगों ने मुझे बांध दिया है।

वो 10 पुलिसवाले थे, और उन सब ने मुझे पीटना शुरू कर दिया। मेरे शरीर के हर अंग पर आघात करते हुये एक के बाद एक 'चार' लाठियां टूट गईं। मैं दर्द के मारे फर्श पर पड़ा छटपटा रहा था। मैंने उनसे दया की भीख मांगी, घिसटते हुए उनके पास गया। वे मुझे फुटबॉल की तरह किक मार रहे थे, मैं उनसे भीख मांग रहा था। फिर वो लकड़ी का एक पट्टा लाये और उससे ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद ये भी टूट गया। अब मैं दर्द से चीख रहा था।

ये दर्दनाक सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके बाद मैं सीधा लेट गया (लिटाया गया) और वे बरगद की एक लकड़ी से मुझे पीटने लगे। मैं अर्धविक्षिप्त, अर्धचेतन (बेहोशी) हालत में पड़ा हुआ था।

3 बजे के लगभग मेरी आँख खुली और मैने उनसे पानी मांगा। मैं प्यास के कारण मरा जा रहा था और मैंने उनसे पानी पिलाने की भीख मांगी। एक अधिकारी ने हवलदारों ने मेरे मुंह में पेशाब करने को कहा, लेकिन शुक्र है उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब मेरी सांस बिल्कुल छूटने को आ जाती, तब वो लोग चम्मच में पानी ले कर मेरे होंठों को गीला कर देते। वे यह जानना चाहते थे कि जॉर्ज (फर्नांडिस) कहाँ है, और लैला (जॉर्ज की पत्नी) और उसका बच्चा सितंबर 1975 में बैंगलोर क्यों आये थे। वे यह भी जानना चाहते थे कि उनकी आगे मद्रास तक कि यात्रा में मैं उनका हमसफ़र क्यों बना?

मेरी हालत इतनी नाजुक थी कि उन्हें लगा कि मैं कभी भी मर सकता हूँ। एक अधिकारी ने हवलदार को जीप तैयार करने को कहा। मैंने उस अधिकारी को अपने आदमियों से कहते हुए सुना, "इसे किसी चलती हुई रेलगाड़ी के सामने फेंक देते है, और कह देंगे कि इसने आत्महत्या कर ली" अब तक मैं पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका था। मेरे शरीर के पूरे बांये हिस्से में फ्रैक्चर हो गए थे और मेरी जांघें बुरी तरह दर्द कर रहीं थी। मेरी टांगें और हाथ सूज गए थे।

अब मुझे एक जीप में डाल दिया गया जो मल्लेश्वरम की तरफ आगे बढ़ने लगी। मुझे लगा कि वो अधिकारी अपनी धमकी के हिसाब से मुझे रेलगाड़ी के सामने फेंकने ले जा रहा है, इसलिए मैं उससे दया की भीख मांगने लगा। लेकिन अब तक उन लोगों का इरादा बदल चुका था। मुझे वयालिकवल पुलिस स्टेशन के लॉकअप में ले जाया गया। अगले दिन मुझे फिर से वापस गुप्तचर दल के दफ़्तर (सीओडी) लाया गया।

यहाँ मैंने पहली बार एक जानी-पहचानी महिला की आवाज़ सुनी। ये स्नेहलता रेड्डी थीं जो चीख रही थी। पुलिस ने किसी को मेरी मसाज करने के लिये बुलाया। उसने मेरे अंगों पर तेल लगाया, लेकिन जल्दी ही उसने जवाब दे दिया, और कहा कि वो मेरी मदद करने में असमर्थ है। उसने अधिकारी को मुझे किसी अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

अगले दिन वो मुझे एक होटल की पहचान करने ले गया जहाँ कभी जॉर्ज ठहरे थे। कुछ देर बाद हम वापस सीओडी आ गए। मैं भूंख ले मारे बेदम हो रहा था। जब मैंने उनसे खाने के लिए गुहार लगाई, तो उन हवलदारों ने गालियों की बौछार कर दी। मेरे परीक्षण के लिए एक डॉक्टर को बुलाया गया। उसने मेरा परीक्षण किया और कुछ दवाइयां लिख कर दीं। अगले कुछ दिन तक मैं मल्लेश्वरम पुलिस स्टेशन में रहा।

मुझे इतना दर्द होता था कि पेशाब कराने तक उन हवलदारों को ही ले जाना पड़ता था। 9 मई को जबरदस्ती मेरे बाल कटवाए गए, दाढ़ी बनवाई गई और नहलाया गया लेकिन इतनी सब सफाई के बाद भी वापस वही बदबूदार और गंदे पहनाये गए।

कुछ देर बाद सादा कपड़ों में दो पुलिस अफसर मेरे पास आये और मुझे बाहर खड़ी गाड़ी में ले गए। अब तक मैं पूरी तरह टूट चुका था और मैं रो पड़ा। उन्होंने मुझे बताया मेरे साथ जो कुछ हुआ, उसके लिए वो जिम्मेदार नहीं थे। अब वो कोशिश (उनका झूठा उत्तरदायित्य था) कर रहे थे कि मुझे चित्रदुर्ग (150 किमी दूर एक छोटा सा कस्बा) से गिरफ्तार किया गया है।

लेकिन फिर वो लोग मुझे दावणगेरे ले गए। यहाँ मुझे बताया गया कि आज मुझे एक मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर किया जाएगा, और मुझे मजिस्ट्रेट को ये बताना है कि मुझे उसी दिन बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया है। मेरी लिए 'एक ओर कुआं, एक ओर खाई' में फंसने वाली स्थिति थी।

दो स्थानीय इंस्पेक्टर मेरे पास आये, उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैंने मजिस्ट्रेट को पुलिस के टॉर्चर के बारे में बताया, तो मेरे परिवार को मार दिया जाएगा। अब वे मुझे मजिस्ट्रेट के पास ले जा रहे थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपना मन बदल दिया, और वे मुझे वापस पुलिस स्टेशन ले आये।

बाद में वे मुझे मजिस्ट्रेट के कोर्ट में ले गए। मुझे नंगे पैर चलने के लिए मजबूर किया गया। मेरे पैर सूज कर आकार में दोगुने हो गए थे।

मजिस्ट्रेट ने मुझसे पूछा कि मुझे कब गिरफ्तार किया गया था? मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल पाए क्योंकि मैं अधिकारियों द्वारा बताई गई तारीख और समय भूल गया था (एक तरह से मैं हक्का-बक्का था)। तब मजिस्ट्रेट ने स्वीकारोक्ति में अपना सर हिलाते हुए मुझसे खुद पूछा कि क्या मुझे कल बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया था। मैं मौन रहा और मजिस्ट्रेट ने मुझे 20 मई तक कि पुलिस कस्टडी में भेज दिया।

इस बार मुझे एक बड़े लॉकअप रूम में रखा गया, जिसमे मेरे साथ एक और आदमी था जो 50,000 रुपयों की चोरी के किसी मामले में संलिप्त था। वो पुलिसवालों पर हुक्म चला रहा था, और जब उसका मन करता, उसे खाना और सिगरेट मिल जा रहा था। उसने मुझे तसल्ली दी, और वादा किया कि मुझे जो कुछ चाहिए वो सब मिलेगा। हवलदार और दरोगा उसकी खूब जी हुजूरी कर रहे थे। बाद में, उसका अपराध सिद्ध हो जाने के बाद मैं उससे जेल में फिर मिला।

11 मई को वे मुझे वापस बंगलौर लाये और मल्लेश्वरम लॉकअप में बंद कर दिया। इसके बाद मुझे मल्लेश्वरम अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि मेरा एक्स-रे करना पड़ेगा। पुलिस वालों ने इसकी इजाजत नहीं दी और मुझे वापस पुलिस स्टेशन लाया गया।

अगले दिन मुझे छावनी (कैंट) स्थित बौरिंग अस्पताल ले जाया गया, जहाँ पर डॉक्टर ने मेरी 'ऊपरी' जांच-पड़ताल की और बुरी तरह व्यवहार किया।

मुझे फिर से वापस मल्लेश्वरम लाया गया, जहाँ पर उन्होंने मुझे दवाइयां खिलाना शुरू कर दिया। इसकी वजह से मुझे पेचिस हो गयी और मैं 3 दिन तक परेशानी भोगता रहा। तब उन्होंने मुझे दूसरी दवाइयां दीं, और मेरी हालत में सुधार आया। पुलिस वाले इस बात को लेकर चिंतित थे कि 20 तारीख को मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने से पहले मेरी हालत में सुधार आ सके।

मल्लेश्वरम में एक पुलिस अधिकारी हर शाम मुझ पर एक पेय पीने का दवाब बनाता था, लेकिन एक दूसरे हवलदार ने मुझे ऐसा न करने की सलाह दी थी। अगले दिन एक वरिष्ठ अधिकारी मेरे पास आया। उसने मुझसे कहा कि उसे मेरी इस दुर्दशा की पूरी जानकारी है। उसने मुझे भरोसा दिलाया कि मैं 20 तारीख को आजाद हो जाऊंगा। लेकिन अगले दिन जब मैं मजिस्ट्रेट के पास पहुंचा, तो मुझे अपनी जमानत देने वाला कोई भी नज़र नहीं आया। मैने अपने ऊपर हुए अत्याचारों के बारे में मजिस्ट्रेट को बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने मेरी शिकायत दर्ज कर ली है।

इसके बाद वे मुझे सीधे सेंट्रल जेल ले गए और इसी के साथ मेरी सारी उम्मीदें धूमिल हो गईं। जीप को सीधा सेल तक ले जाया गया। दुर्भाग्यवश जेल वार्डन एक 6 फुट लंबा, काला, भारी भरकम आदमी था। मैं उसे देखते ही सहम गया। उन्होंने मुझे बांध दिया, मेरी जेब से बीडीं निकाल लीं, और मुझे मृत्युदंड भोगी अपराधियों की एक कालकोठरी में फेंक दिया। वहाँ चारों तरफ अंधेरा और बदबू फैली हुई थी।

मुझे हल्की-हल्की बेहोशी आ रही थी।

तभी मैंने एक आवाज़ सुनी, जो बार-बार मुझे बुला रही थी। मेरे चारों तरह आवाजें ही आवाजें। उन आवाजों में एक आवाज़ मुझे जानी पहचानी लगी। ये मधु (दंडवते) थीं। मैं घिसटते-घिसटते कोठरी के दरवाजे तक गया, और जालियों को पकड़ कर टिक गया।

मधु ने आवाज़ लगाई... "क्या तुम हो, लॉरेंस? मुझे जवाब दो। क्या तुम्हें प्रताड़ित किया गया?"

मैंने बड़ी लाचारी से कहा- "हाँ"। और फिर बाहर एक हलचल शुरू हो हई। सभी बंदियों में ये अफवाह फैल गयी कि बेलगाम जेल का एक फरार बंदी फिर से पकड़ लिया गया है और यहाँ लाया गया है।

जल्द ही जेल महानिरीक्षक, जेल अधीक्षक और डॉक्टर मेरे पास आये। वे अपनी पूरी तेज आवाज़ में मुझ पर चीख रहे थे। मेरा मानना है कि वो मुझे दिमागी रूप से रोगी बनाने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि, मुझे सांस लेने में हो रही तकलीफ़ के कारण, उन्होंने जैसे तैसे मुझे बाहर सो जाने दिया। इसके बाद दंडवते और अन्य मीसा बंदियों ने जेल में भूंख हड़ताल कर दी। उनकी मांग थी कि मुझे इस मृत्युदंड भोगी कालकोठरी से मुक्त किया जाए, और रहने की बेहतर व्यवस्था की जाए।

अगले दिन संभवतः मेरा सबसे छोटा भाई रिचर्ड, और मेरी माँ मुझसे मिलने आये। मुझे वो मुलाकात अच्छे से याद नहीं। जेल अपने आप में एक दुनिया होती है। यदि मैं आजाद रहा, तो जेल में सुधारों के लिए संघर्ष करूँगा।

जेल के अधिकारी मुझे विक्टोरिया अस्पताल ले गए, जहाँ मेरा एक्स-रे और उसके बाद प्लास्टर हुआ। मीसा आदेश 22 मई को आया। अधीक्षक इसे लेना चाहता था, लेकिन मैने उसे ये देने से मना कर दिया। जब मैं पेशाबघर में था, तो उसने मेरी सेल की तलाशी ली लेकिन उसे कुछ नहीं मिला।

कुछ दिन बाद वो अपने एक अनुगामी के साथ वापस आया, और मुझसे मेरा हाल चाल पूछा। मैं गुस्से में उखड़ पड़ा और उसे वहाँ से चले जाने के लिए कहा... क्योंकि उसने अपना वादा तोड़ दिया था। उसने मुझे बंद करने की धमकी दी तो मैने उससे कहा कि तुम मुझे गोलियों से भून दो। मैंने कहा- "मौत सब के लिए समान है, मेरे लिए भी, तुम्हारे लिए भी"।

(जुल्म की इंतिहा का यह किस्सा जारी रहेगा... लेकिन अगले हिस्से में कहानी ऐसी,जिसमें एक अभिनेत्री की मौत हो गई...)

पुस्तक- इमरजेंसी रिटोल्ड, लेखक- कुलदीप नैयर, मूल्य 295/- (पेपरबैक), प्रकाशक- कोणार्क पब्लिकेशन)