ये कहानी है 19 महीने के उन अंधेरे दिनों की, जिन्हें हम आपातकाल (इमरजेंसी) के नाम से जानते हैं। कथित फासीवादी शक्तियों से लोकतंत्र को बचाने के लिए हज़ारों-हज़ार लोगों को बिना कारण बताए जेल में ठूंस दिया गया। इनमें से अधिकतर की गिरफ्तारी मीसा (मैंनेटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत हुई थी। विडंबना देखिए कि ये वही कानून था जिससे तहत तस्करों, ड्रग-माफियाओं को पकड़ा जाता था। फिर चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की गिरफ्तारी रही हो या किसी और नेता की... हम यहाँ जो किस्सा लाए हैं वह जॉर्ज फर्नांडिस को पकड़ने के लिए पुलिस द्वारा उनकी मित्र और कन्नड़ कलाकार स्नेहलता रेड्डी पर किए गए बेइंतिहा शोषण का है। इसे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर साहब की किताब इमरजेंसी रिटोल्ड से लिया गया है। हिंदी में अनुवाद किया है अभिषेक गोस्वामी 'हर्षवर्धन' ने...

ये हृदय विदारक कहानी है स्नेहलता रेड्डी की। एक दुबली-पतली लड़की, स्नेहलता रेड्डी को बैंगलोर में राजनीतिक संदेह के चलते 1 मई 1976 को जेल में डाल दिया गया। उसके ऊपर लगे आरोप उजागर नहीं किये गए। कोई सवाल नहीं पूछा गया।

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए स्नेहलता एक बहु-पुरुस्कार विजेता कन्नड़ फ़िल्म 'संस्कार' की हीरोइन के रूप में प्रसिद्ध थी। (फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन उसके पति पट्टाभि ने किया था)। स्नेहलता बैंगलोर थिएटर और वर्ल्ड ऑफ आर्ट्स की भी एक मुख्य चेहरा थीं।

संबंधित, पढ़ने लायक:
आपातकाल के मायने: मौत सब के लिए समान है, मेरे लिए भी, तुम्हारे लिए भी

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि वो समाज के हर तबके के लिए एक जाना-पहचाना नाम थीं- चाहे वो समाजवादी नेता हों, बुद्धिजीवि हों, देश विदेश के मंच अभिनेता हों, लेखक हों, चित्रकार हों, जादूगर हो, और सबसे बड़ी बात वे युवा, जो अभी तक जीवन का सही अर्थ और उद्देश्य ढूंढ रहे हों। उसके घर के दरवाजे दोस्तों के लिए दिन-रात खुले रहते थे।

यह उसकी मित्रता की परिधि और गर्माहट ही थी, जिसने उसे जेल पहुंचाया। वह एक लंबे समय से जॉर्ज फेर्नांडिस की मित्र थी। अब इन बदले हुए हालातों में उनकी इस मित्रता का ये अनदेखा पहलू ही उसे अनवरत दुःखद परिणामों की ओर लेता चला गया।

स्नेहलता का सुंदर संसार रातों-रात तबाह हो गया और उसके जीवन में भय और अनिश्चितता का एक दुखद स्वप्न शुरू हो गया। उसकी बेटी नंदना को पूछताछ के लिए दो बार पकड़ा गया, और उसके परिवार को निगरानी में रखा गया।

27 अप्रैल को, उसे और पट्टाभि को अपनी नई फिल्म की शूटिंग लाइट्स की व्यवस्था करने के लिए मद्रास निकलना था। तभी नंदना को पूंछताछ के लिए तीसरी बार पकड़ लिया गया।

स्नेहलता शाम को 7 बजे घर लौटीं। किसी को भी इस बारे में सूचना नहीं दी गयी थी और परिवार चिंता के कारण बेहाल हो रहा था। उसके अचानक गायब होने ने पूरा कार्यक्रम बिगड़ दिया था। सभी लोग परेशान हो गए थे। अंत में, वे अपने पुत्र कोणार्क को घर पर छोड़कर, रात को 9 बजे मद्रास के लिए निकले।

आधीरात को दरवाजे पर एक दस्तक हुई। बाहर खड़े आदमी ने आवाज़ लगाई- "टेलीग्राम"। कोणार्क ने दरवाजा खोला तो अचानक से पुलिस का एक झुंड घर के अंदर घुस आया और उसके दोनो हाथ जकड़ लिए। जब उन्हें ये पता चला कि बाकी परिवार मद्रास चला गया है, वो उसे खींचकर पुलिस स्टेशन ले गए।

अधिकतर पुलिसवाले घर की छानबीन करने के लिए वहीं रुक गए और स्नेहा के 84 वर्षीय पिता और नौकरों से बेइंतहा सवाल पूंछने लगे। अंततः अगली सुबह 6 बजे पुलिस चली गयी।

मद्रास में जो सबसे पहली ख़बर रेड्डी परिवार ने सुनी, वो यह थी कि लंबे समय से उनके दोस्त अप्पा राव और उनकी बेटी को पिछली रात गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने तत्काल बैंगलोर फ़ोन लगाने की कोशिश की, लेकिन उनका फ़ोन काट दिया गया था। अंत में एक पड़ोसी से संपर्क होने पर उन्हें पता चला कि पिछली रात क्या हुआ है। उन्होंने बैंगलोर वापस लौटने का फैसला किया और सामान पैक करने के लिए होटल पहुंचे।

बैंगलोर पहुंच कर स्नेहा और उसके पति को कार्लटन हाउस ले जाया गया जहाँ उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। बाकी लोगों को घर पहुंचा दिया गया। कोणार्क के बारे में अभी तक कुछ भी पता नहीं चल पाया था।

एक दिन पहले गाड़ी ड्राइव करके मद्रास तक जाने और अगले ही दिन वापस लौटने के कारण स्नेहा और पट्टाभि बुरी तरह से थक गए थे।

पूरी रात उन्हें एक कमरे में बिठाये रखा गया। वो जब भी ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से इस बारे में सवाल करते, तो हर बार एक ही जवाब मिलता- "अभी थोड़ी देर में अफसर आ रहा है"। पूरी रात कोई नहीं आया।

अंत में उसे और उसके पति को पूछताछ के लिए अलग अलग कमरों में ले जाया गया। जाने अथवा अनजाने में किये गए इस अपघर्षण ने अपना असर दिखाया। इस से पहले कि कुछ भी बोला जाता, या कोई सवाल पूछा जाता, स्नेहा खुद ही बोल पड़ी, "मेरे बेटे को वापस ले आओ, मेरे पति को छोड़ दो और वादा करो कि मेरी बेटी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाओगे। इसके बदले में मैं तुम्हें वो सब बता दूंगी जो मुझे पता है"।

अब तक के इस घटनाक्रम में कोई भी बात रेड्डी परिवार के खिलाफ नहीं थी, सिवाय इस एक बात के कि उनकी 'एक राजनीतिक शरणार्थी' से दोस्ती है। लेकिन अब आचानक से स्नेहा जिस दुनिया में कदम रख चुकी थी, उसके लिए वो एक दम से अजनबी थी। थकी हारी, नींद से ग्रसित और अपने बेटे की फिक्र में वो एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ी थी, जो उसे प्रत्यक्ष रूप से बुरी तरह फंसाने वाला था।

उसके परिवार को बड़े अच्छे ढंग से उसके सामने लाया गया ताकि उसे उनकी सलामती की तसल्ली हो सके। इसके बाद सबको वापस घर भेज दिया गया, और उसे अकेले कैद रखा गया। अगला हफ्ता आशावान लग रहा था।

स्नेहा से बार-बार पूंछताछ की जाती थी, लेकिन उसके पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। उसके परिवार को उसका बिस्तर, खाना और कपड़े लाने, ले जाने की अनुमति दी गयी थी। उसके साथ एक राजनीतिक बंदी की तरह व्यवहार किया जा रहा था, जिसके परिवार वालों को उस से मिलने की अनुमति थी।

7 मई की शाम को जब पट्टाभि खाना ले कर कार्लटन हाउस पहुंचा, तो उसने देखा कि वहाँ कोई नहीं है और ताला लगा हुआ है। पट्टाभि को लगा कि उसे पूछताछ के लिए कहीं ले गए है, इसलिए वे लोग वहीं बैठकर इंतजार करने लगा। रात को 10:30 बजे वो लोग घर वापस लौट गए लेकिन अर्धरात्रि में फिर से कार्लटन हाउस पहुंच गए। वहाँ अब भी कोई नहीं था। वे घर वापस घर लौट आये और इधर-उधर फ़ोन घुमाने लगे, लेकिन सब व्यर्थ था। पूरी रात कोई भी नहीं सो सका। अगली सुबह किसी अनजान लेकिन दयालु व्यक्ति ने उन्हें फोन करके बताया कि उसे संदेह है कि स्नेहा को जेल भेज दिया गया है।

ठीक पहली बार की तरह इस बार भी उसके परिवार को सूचना दिए बिना उसे धोखे से जेल भेज दिया गया। उस दिन देर दोपहरी उसे बताया गया कि उसे रिहा किया जा रहा है, और उसे सामान पैक करने को बोला गया। पहला पड़ाव था एक मजिस्ट्रेट की अदालत।

सुनवाई तब तक बिल्कुल सहज चल रही थी, जब तक स्नेहा ये नहीं सुना था, "तुम्हें कैद में भेजने का आदेश दिया जाता है।" मजिस्ट्रेट ने कहा कि जैसे ही उसका परिवार जमानत के पैसे जमा करवा देता है, उसे छोड़ दिया जाएगा। स्नेहा ने एक पुलिसवाले से उसके पति को फ़ोन कर उसकी यथास्थिति बताने के लिए कहा। वह खुद एक टेलीफ़ोन से अपने घर पर संपर्क करने का प्रयास करने लगी लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। अगली सुबह तक उसके परिवार को उसकी गंभीर स्थिति के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका।

इसी बीच कागजों पर हस्ताक्षर लिए गए और आदेश पास कर दिया गया। स्नेहा को वापस कार्लटन हाउस ले जाया गया। अब तक शाम हो चुकी थी। मई के उस दिन में, सूर्यास्त के समय, स्नेहा को एक मनहूस, ठंडी पत्थर की जेल में ले जाया गया, जिसका नाम था- 'बैंगलोर केंद्रीय कारावास'। वहाँ पहुंचते ही उसे ढेरों अपमानजनक अनुभवों का सामना करना पड़ा।

उसके सामान की बारीकी से जांच पड़ताल की गई, बंदी रजिस्टर में उसके हस्ताक्षर और उंगलियों के निशान दर्ज किए गए और उसके हाथ बांधकर उसकी तलाशी ली गयी।

फिर उसे एक हवादार कोठरी में बंद कर दिया गया, जिसका आकार एक व्यक्ति के हिसाब से पर्याप्त था। पेशाबघर की जगह पर कोने में एक छेद बना हुआ था, और दूसरे छोर पर लोहे का एक जालीदार दरवाजा लगा हुआ था। सौभाग्य से उसका बिस्तर उसके पास था, और स्नेहा ने जैसे-तैसे फर्श ओर सो कर रात गुजारी। उसका भय और निराशा, परिवार के प्रति उसके रोष की वजह से कुछ और बढ़ गए थे, जिन्होंने अब तक उसे छुड़ाने का या उससे मिलने तक का कोई भी प्रयास नहीं किया था। उसे यह जानकारी नहीं थी कि पुलिस वालों ने उसके बारे में उसके घर पर कोई ख़बर नहीं की है और उसके घर वाले पूरी रात से इसी चिंता में जाग रहे हैं।

अगली सुबह स्नेहा के परिवार वालों ने उसका पता लगा लिया। वे उस से मिले, और फिर मजिस्ट्रेट के पास जमानत के लिए अर्जी देने गए। मजिस्ट्रेट ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अगर उनका वकील उचित तरीके से जमानत के लिए अर्जी देता है, तो उन्हें जरूर जमानत मिलेगी। हालांकि वकील उतना आश्वस्त नहीं था, लेकिन फिर भी उसने प्रयास किया। उसे निजी तौर पर ये बताया गया था कि यह एक गैर-जमानती केस है। कैद की अग्निपरीक्षा आरम्भ हो चुकी थी, केस खुल चुका था!

स्नेहा पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120, 120ए के तहत आरोप लगाये गए। लेकिन अंत में कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हो पाया, और राज्य ने उन्हें वापस ले लिया। लेकिन 'मीसा' के तहत स्नेहा की कैद जारी रही। सभी संभव प्रयास बेकार सिद्ध हुए।

जेल की वास्तविकताओं ने स्नेहा को धीरे-धीरे पतनोन्मुख कर दिया था। वह शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गयी थी और अंत में स्वास्थ्य कारणों से उसे आज़ाद करना पड़ा।

जेल से छूटने के कुछ ही समय बाद, 20 जनवरी 1977 को, हृदयाघात (हार्ट अटैक) के कारण उसकी मौत हो गयी।

ऐसे न जाने और कितने ही लॉरेंस और स्नेहलता थे। वे सब के सब इस अत्याचार और ज्यादती के भुक्तभोगी बने।

(इस श्रृंखला के अगले और अंतिम हिस्से में पढ़िए कि कैसे इंदिरा गांधी की सरकार ने लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था में ही परिवर्तन लाने पर विचार किया था)

पुस्तक- इमरजेंसी रिटोल्ड, लेखक- कुलदीप नैयर, मूल्य 295/- (पेपरबैक), प्रकाशक- कोणार्क पब्लिकेशन