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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला। 17 साल बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता मिली। उत्तर प्रदेश के इतिहास में आजादी के बाद तीसरी बार इतनी सीटें किसी पार्टी को नसीब हुईं। भाजपा ने करीब 39.7 फीसदी वोटों के साथ 312 सीटें जीतीं। जबकि 13 सीटें भाजपा के सहयोगी दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल को मिलीं। भाजपा की बंपर जीत ने न सिर्फ विपक्षी दलों को धराशाई किया बल्कि पॉलिटिकल पंडितों के आंकलन भी पस्त कर दिए। भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी के विकास मॉडल को जीत का श्रेय दिया। साथ ही ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे के साथ समाज के हर वर्ग को धन्यवाद दिया। खासकर मुस्लिम महिलाओं को भाजपा ने काफी सराहा और उनके समर्थन का दावा किया।

सरकार के केंद्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा प्रवक्ताओं ने अपनी जीत में मुस्लिम महिलाओं के योगदान का जिक्र किया। मुस्लिम महिलाओं के समर्थन को सीधे तौर पर ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से जोड़ा गया। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिमों की हितैषी समझे जाने वाली पार्टियों (सपा, बसपा, कांग्रेस) ने उत्तर प्रदेश चुनाव में ट्रिपल तलाक़ का जिक्र तक नहीं किया। न ही इन पार्टियों ने मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाने की कोई सार्वजनिक अपील की। जबकि भाजपा ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में रैलियों के दौरान ट्रिपल तलाक़ को मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन करार दिया। पार्टी का मानना है कि ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर भाजपा के सकारात्मक रुख को देखते हुए मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा उम्मीदवारों के लिए वोट किया।

परिवार से हटकर मुस्लिम महिलाओं की 'स्वतंत्र' सोच?

लेकिन क्या वाकई ऐसा हुआ है कि भाजपा की 'विरोधी समझे जाने वाली कौम' ने उसे वोट किया? खासकर मुस्लिम महिलाओं ने, अपने परिवार और समाज से ऊपर उठकर भाजपा के लिए वोट किया? क्या वाकई ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा मुस्लिम महिलाओं को इतना परेशान कर चुका है कि उन्हें इस मसले का हल तलाशने के लिए भगवा पार्टी का सहयोग करना पड़ा? या फिर ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा भाजपा ही सुलझा सकती है, इस्लामिक तंज़ीमों या धर्मगुरुओं के बस में इस मसले का कोई हल नहीं है? या फिर भाजपा इस मुद्दे के जरिए मुस्लिमों के पर्सनल लॉ में दखल देने की कोशिश कर रही है?

अगर ऐसा हो तो फिर भाजपा को 2016 से पहले ये मुद्दा क्यों याद नहीं आया। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को शानदार जीत मिली, लेकिन न चुनाव से पहले और न जीतने के बाद भाजपा ने कभी ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा उठाया। बावजूद इसके भाजपा को 2014 के आम चुनाव में मुस्लिमों ने उम्मीद से ज्यादा वोट किया।

आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं

लोकनीति, सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोशाइटीज़) के आंकड़ों के मुताबिक 2014 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में करीब 10 फीसद मुसलमानों ने भाजपा के लिए वोट किया। इससे पहले 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 7 फीसद और 2007 के विधानसभा चुनाव में 3 फीसद मुस्लिम वोट मिला। उत्तर प्रदेश में सीएसडीएस के निदेशक प्रोफेसर अनिल कुमार वर्मा का मानना है कि प्राथमिक तौर पर ये नज़र आता है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहले चुनावों की तुलना में कम वोट मिला है। मुस्लिम महिलाओं के सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसे आंकड़े अब तक कभी निकाले गए। इसलिए पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा को वोट किया या नहीं। हालांकि प्रोफेसर वर्मा ने बताया कि सर्वे के दौरान आई रिपोर्ट्स के आधार पर कहा जा सकता है कि कुछ महिलाओं ने जरूर ट्रिपल तलाक़ को लेकर भाजपा के प्रति साकारात्मक रुख दिखाया।

दरअसल पिछले एक साल से भाजपा के लिए ये मुद्दा बना। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नाम की एक संस्था है। पिछले साल संस्था ने लगभग 50 हज़ार मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा था। ज्ञापन में ट्रिपल तलाक़ को ग़ैर क़ानूनी बनाने की मांग की गई थी। इस ज्ञापन पर मुस्लिम समाज के कई मर्दों ने भी हस्ताक्षर किए थे। इस संस्था ने तमिलनाडु, ओडिशा, कर्नाटक, पंश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं के बीच जाकर ये काम किया। खास बात ये है कि यह संस्था पिछले 11 सालों से मुस्लिम महिलाओं के बीच काम कर रही है। इस संस्था के पास उत्तर प्रदेश की मुस्लिम महिलाओं का कोई आंकड़ा नहीं है। यानी संस्था ने प्रधानमंत्री मोदी को जो 50 हज़ार हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंपा था, उसमें उत्तर प्रदेश की मुस्लिम महिलाओं का कोई हिस्सा नहीं है।

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक ज़ाकिया सोमन ने बताया कि उन्होंने देश के 10 राज्यों में मुस्लिम महिलाओं के बीच सर्वे किया। ये सर्वे करीब 4700 महिलाओं पर किया गया। ज़ाकिया सोमन के मुताबिक उनके पास करीब 345 ट्रिपल तलाक़ के केस आए। 2012 में सस्था ने दिल्ली में पहली पब्लिक मीटिंग की, जिसमें देशभर से करीब 100 महिलाएं ऐसी आईं जो ट्रिपल तलाक़ से पीड़ित थीं। यानी आंकड़ों पर गौर किया जाए तो ट्रिपल तलाक़ से पीड़ित महिलाओं के बहुत ज्यादा केस नजर नहीं आते। हालांकि ये भी मुमकिन है कि काफी केस कहीं दर्ज ही न होते हों।

पर्सनल मामलों में दखल देने की भाजपा की साजिश

संख्या भले ही कम हो लेकिन जो तरीका अपनाया जा रहा है वो गलत है। हालांकि मुस्लिम धर्मगुरुओं का मानना है कि तीन तलाक़ का गलत तरीका अपनाने वाले लोगों की संख्या सही तरीका अपनाने वालों से काफी कम है। जमियत उलेमा-ए हिंद के प्रवक्ता मौलाना हमीद नोमानी ने साफ तौर पर कहा कि जम्हूरियत में कोई भी किसी पार्टी को वोट दे सकता है। मुमकिन है कि मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा को वोट दिया हो। मौलाना नोमानी ने कहा- हो सकता है कुछ पीड़िता महिलाओं ने ट्रिपल तलाक़ के खिलाफ जाकर भाजपा को वोट किया हो लेकिन जैसा दावा भाजपा कर रही है, वो बिल्कुल बेबुनियाद और बरगलाने वाला है। मौलाना नोमानी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क को समर्थन देते हुए कहा कि मुस्लिम समाज की ज्यादातर महिलाएं शरीयत में सरकार के दखल के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि ये शरिया में दखल देने की भाजपा की साजिश है। मौलाना नोमानी का दावा है कि ये बुराई इस्लाम में नहीं है बल्कि समाज के कुछ हिस्से में है, और इसे खत्म करने के लिए इस्लामिक तंजीमों की तरफ से लगातार कोशिशें की गई हैं। मसलन, 1937 के शरिया एक्ट में संशोधन की मांग की गई। मौलाना असद मदनी ने सदन के सामने एक्ट में सुधार का प्रस्ताव रखा लेकिन सरकार ने उसे मंजूर नहीं किया। हालांकि मुस्लिम महिलाओं के बीच काम करने वाली कुछ महिलाओं का मानना है कि ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर गरमाने के बाद ही पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरी इस्लामिक तंजीमों को ये बुराई नजर आई।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने ट्रिपल तलाक़ के विरोध में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया है। इस अभियान को देशभर से 10 लाख से ज्यादा लोगों का समर्थन मिलने का दावा किया गया है। जिसमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। इसके अभियान के जरिए भी ये संदेश देने की कोशिश की गई कि ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाएं भाजपा के साथ हैं।

ट्रिपल तलाक़ का वर्तमान तरीका सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का ही हनन नहीं है बल्कि इस्लाम और शरिया के भी खिलाफ है

बहरहाल, केंद्र सरकार इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष पहले ही रख चुकी है। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी अपना रुख सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश कर चुका है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि ये मसले न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। बोर्ड ने कहा कि इस्लामिक कानून का परीक्षण संविधान के प्रावधानों की कसौटी पर नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हैं। ट्रिपल तलाक़ का जो तरीका चर्चा में है उस पर मुस्लिम समाज में भी बड़े पैमाने पर विरोध है। लेकिन दरअसल यह तरीका सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का ही हनन नहीं है बल्कि इस्लाम और शरिया के भी खिलाफ है।

ज़ाकिया सोमन का कहना है कि ये मुद्दा सियासी नहीं होना चाहिए क्योंकि ये महिलाओं को उनका हक दिलाने की मुहिम है। ऐसे में इस मुद्दे के आधार पर मुस्लिम महिलाओं ने किसी खास पार्टी को वोट किया, ये कहना जायज नहीं है। दूसरी तरफ, अगर 2014 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम भाजपा को वोट कर सकते हैं तो फिर मुमकिन है 2017 विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने भाजपा को वोट किया हो। फर्क बस इतना है, 2014 की तरह 2017 में ट्रिपल तलाक़ चुनावी मुद्दा नहीं था।

(लेखक भारत के एक बड़े मीडिया संस्थान में टीवी पत्रकार हैं)