कोई भी कालखंड अपनी संवेदनशीलता अगले कालखंड मे नहीं पहुंचाता। वह बस अपनी संवेदना की बौद्धिकता को वहाँ पहुंचाता है। संवेदना के माध्यम से हम हम रहते हैं जबकि बौद्धिकता हमें कोई और बनाती है। बौद्धिकता हमें बिखेरती है और यह इसीलिए है कि जो हमें बिखेरता है, वही हमारे बाद बचता है। हर युग अपने उत्तराधिकारी को वह देता है जो उसके पास नहीं था।

"मुसलमान बुरे होते हैं " इस उपन्यास अकबर की शुरुआत लेखक शाज़ी ज़माँ के बचपन में ही हो गई थी। उनकी उम्र शायद 4-5 बरस की थी। जब लेखक अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ खेल रहा था तभी एक हम-उम्र ने यह लेखक से यह कहा था।

'उस कम उम्र में भी मेरे लिए कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी। तब का या आज का, हमारे समाज में बच्चा ऐसी बातें कहना या सुनना बहुत जल्दी शुरू कर देता है। ज़ाहिर है यह बुज़ुर्गों के शुरूआती असर का नतीज़ा होता है। चौंकाने वाली बात उसके बाद होती है। एक और हम-उम्र ने कहा- नहीं, इनका अकबर भगवान था

4 साल की उम्र में भी लेखक को लगा जैसे "किसी ने इज्जत रख ली"

शाज़ी ज़माँ की पुस्तक अकबर उपन्यास के रूप में लिखी गई लेकिन उस के स्वर में ऐतिहासिकता काफी करीने से संजोई गई है। ज़माँ ने इस उपन्यास के लिए बहुत मेहनत की है।

संग्रहालय से लेकर उस काल के चित्रों में सूक्ष्मता से उतरना और भवनों का सांस्कृतिक पाठ करना निश्चय ही बेहद श्रमसाध्य काम है। कपड़ों के रंग से लेकर मूंछों तक का विवरण देना पाठ को बहुत रोचक बना देता है। पाठ की शैली काफी रोचक है। बादशाह अकबर के अभियान विशेष के बीच में अवकाश के समय बाबरनामा का पाठ सुनना, जो कि आत्मकथात्मक शैली में लिखा है, पाठक को सीधे अकबर के काल से बाबर के समय ले जाता है। पुस्तक में इतने सूक्ष्म विवरण हैं कि पाठक उस काल की 'यात्रा' पर चला जाता है!

लेखन की भाषा हिंदुस्तानी है। उर्दू मिश्रित हिंदी। ऐसी हिंदी जिसके अवशेष आज भी हैं। ऐसे फ़ारसी और उर्दू के शब्द, जो आज के हिंदुस्तान के एक बड़े हिस्से की ज़बान, तब की ज़बान से कितनी मिलती है, यह पाठक को काफी मज़ेदार लग सकती है। कठिन शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, जो पाठ को समझने में आवश्यक मदद करते हैं।

लेखक के मुताबिक ऐतिहासिक होने के बाबजूद यह उपन्यास जिस तरह से बुना गया है, वह पूरी तरह से उनके अपने 'दिमाग की उपज है। ऐसी इजाज़त सौ फ़ीसदी सिर्फ उपन्यासकार को है, इतिहासकार को नहीं। अतः हम कह सकते हैं कि शाज़ी ज़माँ की यह किताब इतिहास होते हुए भी विशुद्ध इतिहास नहीं है।

--पुस्तक दो भागों में बंटी हुई है। पहले हिस्से में बाबर, हुमायूं और अकबर का राजनीतिक संघर्ष केंद्र में है। दूसरे हिस्से में अकबर की धर्म के मामलों में रुचि, उनका आत्म-संघर्ष और उनके दीनी मामलों पर विचार, ख़ासकर दीन को अक़्ल के तराजू से, उसकी कसौटी से उनकी लोहा लेने की हिम्मत, ख़ूबसूरती से प्रकाशित हुई है। कई हिस्से ऐसे हैं जिनको लिखना लेखक की ऐसे मामलों में रूचि, पक्षधरता और अकबर के व्यक्तित्व को संपूर्णता से उभारने के प्रयास के रूप में देखना चाहिए।

अकबर बादशाह धर्म के मामलों में भी तर्क करना पसंद करते थे जो उनके समय के हिसाब से काफी प्रगतिशील बात मानी जा सकती है। वे कहते हैं-

पीर के रूप से विसाल (मिलन) अगर मक़सद है तो दूर और पास मायने नहीं रखता। अगर इरादा ख़ाक की इबादत का है तो यह शिर्क (ख़ुदा के अलावा किसी और को ख़ुदा का दर्ज़ा देना) और बुत परस्ती है।

बादशाह अकबर हालांकि रूढ़ियों के विरोधी थे लेकिन उनकी महानता इसी बात में निहित है कि वे धार्मिक (दीनी) मामलों में दख़ल देना पसंद नहीं करते थे। हिंदुस्तान में उस समय सती की प्रथा थी, जिसमें औरतें अपने पति की मृत्यु के बाद शव के साथ ख़ुद को जला लिया करती थीं। जयमल की मौत के बाद उनकी पत्नी, मोटा राजा उदय सिंह की बेटी ने जब सती होने से इंकार कर दिया था और यह ख़बर जब बादशाह को मिली कि मोटा राजा और जयमल के बेटे ज़ोर-ज़बरदस्ती करना चाहते हैं तो उन्हें रोकने के लिए वह ख़ुद ही घोड़े पर सरपट दौड़ पड़े थे।

पादरियों को अपने दरबार में बादशाह ने खुद बुलवाया। उनके रहने-खाने के बेहतरीन इंतज़ाम करवाये और उनसे लंबी-लंबी बातें कीं। अपने दरबार के अमीर-उमरा को उन बहसों में शामिल करवाते थे। ज़माँ इन प्रकरणों का अपेक्षित विस्तृत वर्णन करते हैं। शायद इसलिए कि पाठक इस बात से दीक्षित हो सके कि स्वयं से समझ-बूझ कर धार्मिक मामलों में भी लोग अपनी राय बनाएं।

बादशाह अकबर ने दो पादरियों को लंबे समय तक अपने दरबार में रखा और अपने महल के पास ही उनके ठहरने का प्रबंध करवाया था। उनमें से एक पादरी मोनसेराते ने अपने एक पत्राचार में लिखा था की उन्हें ऐसा लगने लगा था कि सभी धर्मों से कुछ बातें लेकर वह एक नया धर्म शुरू करना चाहते हैं। ''पादरी धीरे धीरे उंनकी महफिलों से दूर रहने लगे क्योंकि इस वक़्त बादशाह रोज़-ब-रोज़ हिंदुओं पर मेहरबान होते जा रहे थे। उनकी गुज़ारिश पर बादशाह सलामत ने बाजार में गाय के गोश्त की बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी।''

अकबर धर्म के मामले में भी तर्क-वितर्क करते थे और यह सभी धर्म के लोगों को खासकर, वे जो धर्म की व्याख्या और प्रचार प्रसार में लगे हुए लोग थे, को यह बर्दाश्त नहीं होता था। एक पादरी बादशाह से कहता है- अगर कोई भी इल्म हासिल करने के लिए वक़्त चाहिए तो खुदा की बातों को जानने के लिए हज़रत बादशाह को और ज़्यादा वक़्त देना होगा। हम यहाँ दिन रात रहने को तैयार हैं, अगर बादशाह सलामत वक़्त निकालें और उसे सुनने की ख़्वाहिश रखें बिना टोका-टाकी के, जो कि आप करते हैं और यह ख़ुदाई क़ानून की बेअदबी है। यह हमारी ग़ैर-ज़िम्मेदारी होगी अगर हम ऐसे में भी दीन की तालीम दें और हम ऐसा करना नहीं चाहते। यह हम पर और हजरत बादशाह आप पर, आएगा।

एक दूसरे पुर्तगाली पादरी रुडॉल्फ एकुआवीवा ने यीशु समाज के प्रमुख पादरी मरक्यूरियन को 18 जुलाई 1580 ईस्वी को चिट्ठी लिखी थी जिसमें उन्होंने अपनी यह आशंका ज़ाहिर की थी बादशाह धर्म बदलेंगे। उन्होंने लिखा था, पहले तो यह कि वह हर चीज़ पर शक़ करते हैं और इसलिए उनके लिए इतना काफ़ी नहीं कि दीन की किताब के जरिए समझा दिया जाए। वह अपनी अक़्ल से इसे समझना चाहते हैं।'

बादशाह अकबर हिंदुओं के रीति रिवाज़ और उनकी संवेदनाओं का ख़्याल रखते थे। जिसे कट्टरपंथी इस्लाम अच्छी दृष्टि से नहीं देखता था। उनके दरबारी अब्दुल क़ादिर बदायूंनी ने बड़ी पीड़ा से लिखा, जिसे उपन्यास के लेखक ने उद्धृत किया है- जलालुद्दीन अकबर ने जो बहुत ही ग़लत और इस्लामी शरीयत के खिलाफ बातें लागू कीं उनमें से एक यह थी कि गाय का गोश्त खाना हराम कर दिया गया। इसकी वजह यह थी कि बचपन से ही बादशाह कट्टर मज़हबी हिंदुओं के साथ उठता-बैठता था और गाय का एहतराम करना हिंदुओं के अक़ीदे के मुताबिक़ दुनिया की सलामती का सबब है और उन हिंदुओं की ये गलत बातें बादशाह के दिल में घर कर गईं थीं और भारत के बहुत से हिंदू राजाओं की बहुत सी लड़कियां जो हरम में दाखिल थीं वे बादशाह के मिज़ाज में बहुत दख़ल देती थीं। और बादशाह गौमांस लहसुन और प्याज के खाने, हर दाढ़ी वाले और इस तरह के लोगों से परहेज करने लगे थे और आज भी परहेज करते हैं।

अकबर ने निश्चित रूप से हिंदुओं से अच्छे संबंध बनाये और यह जितना राजनीतिक कर्म था उससे कम सांस्कृतिक कर्म नहीं था। और सारे सुबूत तो यह कहते हैं कि उनका ख़ुद का विश्वास भी मिला-जुला था। कई अमीर-उमरा जो उनके दरबारी थे उन्होंने जब दीन-ए-इलाही को अपनाने में रूचि नहीं दिखाई, तो बादशाह बिलकुल भी सख़्त नहीं हुए।

इस संदर्भ में अकबर का एक और वक्तव्य बहुत अच्छा है जिसे उपन्यास लेखक ने लिया है- पहले मैंने लोगों को मजबूर किया कि वह मेरा दीन मानें और मैंने समझा कि यह इस्लाम है। जब मेरी समझ बढ़ी तो मैं शर्मिंदा हुआ। जब मैं खुद ही मुस्लिम नहीं था तो दूसरों को कैसे मजबूर कर सकता हूं कि वह मुस्लिम बनें। जिनका दीन ज़बरदस्ती बदला गया, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह कायम रहेंगे?

शहजादे मुराद ने एक बार जब बादशाह से पूछा कि इबादत तो एक रूहानी चीज़ है और दिल में की जाती है लेकिन अगर लश्कर में कोई पुराने रास्तों पर चलने वाले उलेमा की तरह से माने कि इबादत वह ज़िस्मानी हरक़तें हैं जिसे नमाज़ कहा जाता है और सुबह से रात तक खाना न खाना जिसे रोज़ा कहा जाता है जबकि दरअसल "खुदा की इबादत में ज़िस्म और ज़िस्म की हरक़तें नहीं होतीं तो ऐसे में मैं उसे रोकूँ या छोड़ दूं? तो अकबर ने जवाब दिया अलग अलग तरह के लोगों का होना ख़ुदाई ताक़त है वह पूरी दुनिया के साथ सुलहेक़ुल पर क़ायम रहे, नेकख़्वाहिश रखना और नसीहत देना दोनों ही हर इंसान के लिए मुनासिब है। आप के रास्ते पर आने वाला हर इंसान ख़ुशनसीब है और पुरानी रीत की बंजर ज़मीन में दुखी रहने वाले इंसान मजबूर हैं। ख़ुदा को किसी भी रास्ते से जानना और उसकी इबादत करना अच्छा है ज़िस्म की हरकतों को ख़ुदा की इबादत समझने वाले नासमझ को रोकना ऐसा ही होगा जैसे ख़ुदा को याद करने से रोकना। ये बातें अकबर की परिपक्व दृष्टि के सबूत हैं और ज़माँ ने उनको उद्धृत करके मानो पाठक को भी परिपक्व और दीनी मामलों में ज़्यादा तर्कसंगत होने की सीख दी है।

बादशाह अकबर ख़ुद बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन बचपन से उन्हें जिस तरह की शिक्षा दी गयी थी और जैसा उनका मिज़ाज विकसित हुआ था वह बहुत समावेशी था। उन्हें बहुत सारी पुस्तकों का ज्ञान था। वह पुस्तकों की अंतर्वस्तु जानने में बहुत रूचि लेते थे। उनके निजी पुस्तकालय में चौबीस हजार पुस्तकें थीं जो उस समय के हिसाब से एक बहुत बड़ी संख्या है। उन्होंने पुस्तकों के अनुवाद में बहुत रूचि ली और दुनिया की कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां रहती थीं। अकबर में जो एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अच्छी बात थी वह यह कि उनकी चेतना में अपने समय से आगे की उदारता और खुलापन था। जब शहजादे मुराद ने बादशाह से पूछा कोई 1-2 किताब मुझे मिले जो जहन को बुलंद करें और पुरानी सोच को दूर करें तो इससे मुझे हिदायत मिलेगी बादशाह सलामत ने कहा रिवायत के दलदल में ऐसी किताब शायद ही कोई हो लेकिन तुम्हारा ख्याल करके महाभारत का तर्जुमा भेज रहा हूं जो एक अजीब कहानी है।

बादशाह अकबर के निर्देश पर बदायूँनी ने महाभारत को फारसी में, रज़्मनामा के नाम से अनूदित किया था। बादशाह सलामत को शक हुआ कि मुल्ला बदायूँनी महाभारत को फारसी में करने के बजाय जानबूझकर उसमें क़यामत के दिन के हिसाब की बातें डाल रहे हैं।

इस पर अकबर ने गुस्से में कहा, 'हरामख़ोर!, शलग़मख़ोर! (लालची इंसान)

इससे प्रतीत होता है कि पुस्तक के अनुवाद का दूषण अकबर को स्वीकार नहीं था और इसे उनकी उदात्तता के रूप में ही समझ जाना चाहिए।

लेखक ने वैसे तो पूरी पुस्तक में एक प्रशंसनीय निरपेक्षता (संतुलन) रखी है लेकिन एक चूक हुई है। किताब में एक जगह बाबर का राणा सांगा से युद्ध होता है जिसमें राणा सांगा की फौज हार जाती है। इसके बाद के हिस्से को देखिए...

हसन खान मेवाती, डूंगरपुर के राजा रावल, उदयसिंह, राय चंद्रभान चौहान, चंदेरी के राजा के बेटे इंद्र, मानिक चंद चौहान, दिलीप राय गंगू, कर्म सिंह और राव बिक्रासी मारे गए। इसके अलावा, हजारों की जान गई। दुश्मनों के सर का कल्ला (कटे हुए सिर) मीनार बना। लेखक ने यह हिस्सा उद्धृत नहीं किया है अर्थात यह उसका अपना वक्तव्य है। इस मायने में देखा जाए तो हिंदुओं को 'दुश्मन' के रूप में रखना लेखक की 'प्रगतिशीलता' और उसकी 'संतुलित दृष्टि' पर प्रश्नचिह्न लगाता है। भूतकाल के बारे में लिखते समय किसी भी लेखक को बहुत संतुलन की जरूरत होती है और मामला जब सदियों के इतिहास हो, उसकी स्पर्शकातरता का हो तो यह जिम्मेदारी और भी गंभीर हो जाती है। यह चूक मेरी नज़र में क्षम्य नहीं है। यह कहते समय मैं ज़ोर देकर यह कहना चाहूंगा कि देश में ऐसे विषयों पर लिखते समय मैं ऐसी ही अपेक्षा सबसे रखता हूँ।

पुस्तक की कुछ अन्य कमियां, तानसेन की संगीत प्रतिभा पर शाज़ी ने कम लिखा है। उनके गाये हुए पद तो उन्होंने उद्धृत किये हैं और उस हिंदुस्तानी को पढ़ के हमें मध्यकालीन कवियों, उनकी शैली और भाषा के साथ साम्य का आस्वाद मिलता है लेकिन उनके रागों की महिमा की लोक-चेतना में जैसी सौंदर्यपूर्ण-सरस मौज़ूदगी है उसको यदि उपन्यास में जगह मिलती तो पाठक की एक वाज़िब अपेक्षा पूरी होती। ऐसे ही बीरबल के बारे में भी पुस्तक में अपर्याप्त उल्लेख है। नवरत्नों की जितनी जीवंत उपस्थिति अकबर के दरबार में थी और उसके हिस्से लोक-मानस के हिस्से हैं उस पर उचित वर्णन ऐसी पुस्तक में होना ही होना चाहिए था। एक पाठक के रूप में मैंने इसकी कमी को महसूस किया।

पुस्तक की आवरण सज्जा बहुत सुंदर है। चित्र सुन्दर है। पृष्ठों पर जो चिह्न हैं, उनमें बेहद सुरुचिपूर्णता दिखती है। 350 पृष्ठों की यह पुस्तक राजकमल पेपर बैक्स से प्रकाशित है। पुस्तक एक कालखंड विशेष के सांस्कृतिक भारत का अनोखा इतिहास है, एक ऐसा वृत्तान्त जो आज को समझने की न सिर्फ दृष्टि देता है बल्कि मूल्यांकन के स्वस्थ मानदंड भी देता है। मूल्य 350/- है।